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TMC का नाम और चुनाव चिह्न फ्रीज, ममता बनर्जी और अरूप रॉय के बीच विवाद गहराया

तृणमूल कांग्रेस (TMC) का नाम और चुनाव चिह्न चुनाव आयोग द्वारा फ्रीज कर दिया गया है, जिससे ममता बनर्जी और अरूप रॉय के बीच विवाद और गहरा गया है। यह विवाद अप्रैल 2026 में विधानसभा चुनाव में हार के बाद शुरू हुआ, जब पार्टी दो गुटों में विभाजित हो गई। अब ममता बनर्जी की पार्टी को 'ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' और अरूप रॉय के गुट को 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' का नाम दिया गया है। जानें इस विवाद की पूरी कहानी और चुनाव आयोग के निर्णय के पीछे की वजहें।
 

चुनाव आयोग का निर्णय

चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) का नाम और चुनाव चिह्न अस्थायी रूप से फ्रीज कर दिया है। यह निर्णय पश्चिम बंगाल में होने वाले उपचुनाव से पहले लिया गया है, जहां पार्टी के भीतर चल रहे सिंबल विवाद को लेकर आयोग ने अपना अंतरिम आदेश जारी किया। उल्लेखनीय है कि अप्रैल 2026 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी दो गुटों में विभाजित हो गई है। एक गुट का नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही हैं, जबकि दूसरे का नेतृत्व अरूप रॉय कर रहे हैं। ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी खेमे ने अरूप रॉय को अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) का चेयरमैन नियुक्त किया है।


उपचुनाव की स्थिति

पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा की दो सीटों पर उपचुनाव होने वाले हैं। दोनों गुटों ने अपने-अपने उम्मीदवार तृणमूल कांग्रेस के नाम पर उतारे हैं, जिससे स्थिति में भ्रम उत्पन्न हो गया है। इसी कारण, 17 सितंबर 2026 को चुनाव आयोग ने पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न पूरी तरह से फ्रीज कर दिया है, जिससे दोनों गुट इस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस का नाम और निशान नहीं इस्तेमाल कर सकेंगे।


नए नाम और चिह्न का निर्धारण

अब ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को पश्चिम बंगाल, मेघालय और त्रिपुरा में मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी के रूप में माना जाएगा, और इसका नया नाम 'ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' (MAITC) और चुनाव चिह्न 'फुटबॉल प्लेयर' रखा गया है। वहीं, अरूप रॉय के गुट को 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' (DTC) नाम और 'लिफाफा' चिह्न दिया गया है।


विवाद का इतिहास

क्या है पूरा विवाद?


अप्रैल 2026 में विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस में विभाजन हो गया। नेता प्रतिपक्ष पद पर शोभनदेव चट्टोपाध्याय की नियुक्ति का विरोध करते हुए 59 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना। इसके बाद पार्टी ने ऋतब्रत बनर्जी और विधायक संदीपन साहा को हस्ताक्षर जालसाजी के आरोप में पार्टी से निकाल दिया। इसके बाद ऋतब्रत गुट ने खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बताते हुए जुलाई में पार्टी दफ्तर पर कब्जा कर लिया।


TMC नाम और चुनाव चिह्न विवाद, कब-क्या हुआ?


  • अप्रैल 2026: विधानसभा चुनाव में TMC की करारी हार हुई।

  • मई-जून 2026: नेता प्रतिपक्ष पद पर शोभनदेव चट्टोपाध्याय की नियुक्ति का विरोध हुआ और 59 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना।

  • जून 2026: TMC ने ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को हस्ताक्षर जालसाजी के आरोप में पार्टी से निकाला।

  • जुलाई 2026: ऋतब्रत गुट ने खुद को असली TMC बताया और पार्टी दफ्तर पर कब्जा कर ताला लगा दिया।

  • 16 सितंबर 2026: उपचुनाव की आखिरी तारीख, दोनों गुटों ने TMC के नाम पर उम्मीदवार उतारे।

  • 17 सितंबर 2026: चुनाव आयोग में दिल्ली में सुनवाई हुई।

  • 18 सितंबर 2026: चुनाव आयोग ने TMC का नाम और सिंबल फ्रीज किया, दोनों गुटों को नए नाम-सिंबल के लिए 3-3 विकल्प मांगे।


कौन-कौन इस विवाद में शामिल?

ममता बनर्जी, तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक और मूल नेता हैं। दूसरी ओर, ऋतब्रत बनर्जी बागी गुट के नेता हैं, जिन्होंने 59 विधायकों के साथ अलग होने का निर्णय लिया। संदीपन साहा भी इस विवाद में शामिल हैं, जिन्हें पार्टी से निकाला गया था। शोभनदेव चट्टोपाध्याय को पार्टी नेतृत्व द्वारा नेता प्रतिपक्ष चुना गया था, जिनकी नियुक्ति का विरोध हुआ। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने दोनों गुटों के दावों पर सुनवाई की।


कहां से शुरू हुआ यह विवाद?

यह विवाद पश्चिम बंगाल विधानसभा, कोलकाता से शुरू हुआ। विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी नेतृत्व ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त किया, जिसका विरोध करते हुए ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 59 विधायकों ने बगावत कर दी। इसके बाद दोनों गुट नई दिल्ली स्थित भारत निर्वाचन आयोग (ECI) पहुंचे, जहां 17 सितंबर 2026 को सुनवाई हुई और 18 सितंबर को आयोग ने पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न फ्रीज करने का अंतरिम आदेश दिया।


कैसे सुलझा विवाद?

इस विवाद को सुलझाने के लिए चुनाव आयोग ने 'चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968' के पैरा-15 का उपयोग किया, जो किसी मान्यता प्राप्त पार्टी में टूट होने पर असली गुट और उसके नाम-निशान पर फैसला करने का अधिकार आयोग को देता है।