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TMC में बगावत: विधायकों की सदस्यता पर संकट

पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी के खिलाफ बगावत करने वाले विधायकों की सदस्यता संकट में है। विधानसभा सचिवालय ने 10 बागी विधायकों को नोटिस जारी किया है, जिसमें उन्हें एक सप्ताह के भीतर जवाब देने के लिए कहा गया है। यह मामला अब कानूनी प्रक्रिया में बदल गया है, जिससे टीएमसी के भीतर की गुटबाजी और बढ़ गई है। जानें इस विवाद के पीछे की पूरी कहानी और इसके संभावित परिणाम।
 

TMC में आंतरिक संघर्ष का नया मोड़


TMC में आंतरिक संघर्ष: पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ बगावत करने वाले नेता प्रतिपक्ष रिताब्रता बनर्जी और उनके साथ नौ अन्य विधायकों की विधानसभा सदस्यता संकट में पड़ती दिख रही है। मंगलवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा सचिवालय ने बागी टीएमसी गुट के 10 विधायकों को नोटिस जारी किया। इन नोटिसों में ममता बनर्जी के गुट द्वारा दायर अयोग्यता याचिका पर एक सप्ताह के भीतर जवाब देने के लिए कहा गया है, जिससे विपक्षी पार्टी में तनाव और बढ़ गया है।


रिताब्रता बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट के मुख्य व्हिप अखरुज़्ज़मां अंसारी ने मंगलवार रात को नोटिस मिलने की पुष्टि की। रिताब्रता बनर्जी और अन्य विधायकों - अरूप रॉय, फिरहाद हकीम, संदीपन साहा, अखरुज़्ज़मां अंसारी, शिउली साहा, सबीना यास्मीन, बिप्लब मित्रा, जावेद खान और रथिन घोष - को नोटिस जारी किए गए हैं। विधानसभा के सूत्रों के अनुसार, उन्हें सात दिनों के भीतर जवाब देने के लिए कहा गया है। अंसारी ने कहा, “हम इस मुद्दे पर पार्टी के भीतर चर्चा करेंगे और समय पर उचित उत्तर देंगे।”


गौरतलब है कि ममता बनर्जी के गुट की ओर से विधानसभा में विपक्ष के नेता पद के उम्मीदवार और टीएमसी विधायक सोवनदेब चट्टोपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रिताब्रता बनर्जी और अन्य विधायकों को दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य घोषित करने की मांग की थी। चट्टोपाध्याय ने 7 जुलाई को विधानसभा स्पीकर रथिन बोस को पत्र लिखकर इन 10 विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग की थी, आरोप लगाते हुए कि उन्होंने पार्टी के हितों के खिलाफ कार्य किया है।


विपक्ष के नेता की नियुक्ति का मामला पहले से ही कलकत्ता हाई कोर्ट में लंबित है, जहां चट्टोपाध्याय ने विधानसभा स्पीकर के उस निर्णय को चुनौती दी थी जिसमें रिताब्रता बनर्जी को इस पद के लिए मान्यता दी गई थी। अब इन नोटिसों ने टीएमसी के भीतर गुटबाजी की स्थिति को विधानसभा की कार्यवाही में ला दिया है। अब विरोधी गुट को न केवल पार्टी नेतृत्व के लिए बल्कि सदन में अपने पदों की वैधता को बनाए रखने की चुनौती का सामना करना होगा।