अंतरिक्ष विकिरण: अंतरिक्ष यात्रियों के लिए एक गंभीर चुनौती
अंतरिक्ष यात्रा और विकिरण की चुनौतियाँ
नई दिल्ली: अंतरिक्ष यात्रा एक रोमांचक अनुभव है, लेकिन इसके साथ कई चुनौतियाँ भी आती हैं। इनमें से एक प्रमुख चुनौती है स्पेस रेडिएशन, यानी अंतरिक्ष विकिरण। पृथ्वी पर हमारा चुंबकीय क्षेत्र और वायुमंडल हमें अधिकांश हानिकारक कणों से सुरक्षित रखते हैं। जबकि अंतरिक्ष में, अंतरिक्ष यात्री एक अलग और अधिक खतरनाक विकिरण के संपर्क में आते हैं, जो पृथ्वी पर मिलने वाले विकिरण से कहीं अधिक गंभीर होता है।
अंतरिक्ष विकिरण के तीन मुख्य स्रोत होते हैं। पहला, पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में फंसे कण, जो 'वैन एलन बेल्ट' में मौजूद ऊर्जावान प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन के रूप में होते हैं। दूसरा स्रोत सूर्य से निकलने वाले 'सौर ऊर्जावान कण' हैं, जो सौर ज्वालाओं और 'कोरोनल मास इजेक्शन' के दौरान उत्सर्जित होते हैं। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण स्रोत 'गैलेक्टिक कॉस्मिक किरणें' हैं, जो हमारी आकाशगंगा के बाहर सुपरनोवा विस्फोटों से उत्पन्न होती हैं। ये किरणें सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण होती हैं, क्योंकि इनसे पूरी तरह से सुरक्षा पाना लगभग असंभव है।
अधिक विकिरण के संपर्क में आने से मतली, उल्टी, थकान और त्वचा में जलन जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। लेकिन सबसे बड़ा खतरा लंबे समय बाद कैंसर, हृदय रोग, मोतियाबिंद, तंत्रिका तंत्र को नुकसान और प्रजनन स्वास्थ्य पर प्रभाव के रूप में सामने आता है। जानवरों और कोशिकाओं पर किए गए शोध से यह स्पष्ट हुआ है कि स्पेस रेडिएशन के भारी कण डीएनए को गहराई से नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे पृथ्वी पर मिलने वाले विकिरण से खतरा कई गुना बढ़ जाता है। वैज्ञानिक इस समस्या का समाधान खोजने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।
अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के अनुसार, अंतरिक्ष में विकिरण से बचने के लिए कई रणनीतियाँ अपनाई जाती हैं। इनमें शील्डिंग या सुरक्षा कवच के तहत अंतरिक्ष यान में पानी की टंकी, पॉलिथीन, हाइड्रोजन-समृद्ध सामग्री या मल्टीलेयर ढाल का उपयोग किया जाता है। ये कणों को रोकने में मदद करती हैं। इसके अलावा, विकिरण की निगरानी के लिए नए डिटेक्टर विकसित किए जा रहे हैं, जो रीयल-टाइम में विकिरण की मात्रा और प्रकार की जानकारी देते हैं।
अंतरिक्ष यात्रियों का चयन, प्रशिक्षण और मानसिक तैयारी भी बहुत सावधानी से की जाती है। लंबे मिशनों में नींद, थकान, बोरियत और अलग-थलग माहौल से निपटने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। कई गतिविधियाँ मनोबल बनाए रखने में मदद करती हैं। स्पेस रेडिएशन अंतरिक्ष यात्रा की सबसे बड़ी बाधा है, लेकिन वैज्ञानिक प्रयासों से इसे नियंत्रित किया जा रहा है ताकि इंसान सुरक्षित रूप से चंद्रमा, मंगल और उससे आगे जा सके।
इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर मिशन 6 से 12 महीने के होते हैं, जबकि मंगल मिशन 2 से 3 साल तक चल सकते हैं। इससे कुल विकिरण डोज कई गुना बढ़ सकता है। इसलिए नासा और अन्य स्पेस एजेंसियाँ लगातार नए शोध, बेहतर डिटेक्टर और उन्नत सामग्री पर काम कर रही हैं।