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अफगानिस्तान में मानवीय संकट: परिवारों को बच्चों को बेचने पर मजबूर होना पड़ रहा है

अफगानिस्तान में गहराते मानवीय संकट ने परिवारों को अपने बच्चों को बेचने के लिए मजबूर कर दिया है। रिपोर्टों के अनुसार, अत्यधिक गरीबी और बेरोजगारी के कारण माता-पिता अपने बच्चों को बेचने के लिए विवश हैं। इस स्थिति ने न केवल बच्चों की जिंदगी को खतरे में डाल दिया है, बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक समस्या बन गई है। जानें इस संकट के पीछे के कारण और इसके प्रभावों के बारे में।
 

अफगानिस्तान में बढ़ता मानवीय संकट

नई दिल्ली - हालिया अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में अफगानिस्तान में गहराते मानवीय संकट का उल्लेख किया गया है, जहां परिवारों को अत्यधिक गरीबी के कारण अपने बच्चों को बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।


रिपोर्टों के अनुसार, यह स्थिति अब केवल कुछ मामलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक संकट का हिस्सा बन चुकी है। लगभग तीन-चौथाई अफगान अपनी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस संकट ने परिवारों को जीवित रहने के लिए अकल्पनीय कदम उठाने पर मजबूर कर दिया है, जिसमें अपने बच्चों को बेचना, विशेषकर बेटियों को, शामिल है। रिपोर्टों में भूख, बेरोजगारी और अंतरराष्ट्रीय सहायता में कमी को इसके मुख्य कारणों के रूप में बताया गया है। तालिबान द्वारा महिलाओं और लड़कियों पर लगाए गए प्रतिबंधों ने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है।


घोर प्रांत से आई एक रिपोर्ट में कई परिवारों की कहानी सामने आई है, जो भूख और बेरोजगारी के कारण अपनी बेटियों को बेचने पर मजबूर हो गए। एक पिता, सईद अहमद ने बताया कि उन्हें अपनी पांच साल की बेटी, शाइका को बेचना पड़ा, ताकि उसकी जान बचाने के लिए आवश्यक सर्जरी करवाई जा सके। उन्होंने यह शर्त रखी कि खरीदार शाइका को तभी ले जा सकेगा जब उसकी सर्जरी पूरी हो जाएगी। शाइका की सर्जरी सफल रही और इसका खर्च उस पैसे से उठाया गया जो उसे 200,000 अफगानी (लगभग 3,200 अमेरिकी डॉलर) में बेचने से मिला।


रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि हर चार में से तीन अफगान अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहे हैं। लगभग 50 लाख लोग भूख के आपातकालीन स्तर का सामना कर रहे हैं, और कुपोषण के कारण बच्चों की मौतें बढ़ रही हैं।


बेरोजगारी अपने चरम पर है, स्वास्थ्य सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हैं, और जो सहायता कभी लाखों लोगों की जरूरतें पूरी करती थी, वह अब बहुत कम हो गई है।


संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, माता-पिता का कहना है कि भुखमरी से बचने का उनके पास बच्चों को बेचने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। एक पिता ने अपनी दो जुड़वां बेटियों, रोकिया और रोहिला का परिचय देते हुए बताया कि वे इतने गरीब हो चुके हैं कि अपनी बेटियों को बेचने के लिए भी तैयार हैं।


इससे पहले भी कई रिपोर्टों में ऐसे मामलों का जिक्र किया गया है, जहां माता-पिता ने अपने बच्चों को इसलिए बेचा क्योंकि उनके अन्य बच्चे भूख से मर रहे थे। यह एक सामान्य प्रवृत्ति बनती जा रही है।


विशेषज्ञों का कहना है कि तालिबान के सत्ता में लौटने और अंतरराष्ट्रीय सहायता में कमी के कारण यह संकट और भी गहरा गया है। अब यह स्थिति ऐसी हो गई है कि बड़ी संख्या में लोगों के लिए घोर गरीबी सामान्य बात बन गई है। यूएन की हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि 2025 तक लगभग 2.8 करोड़ लोग गरीबी में जी रहे होंगे।


हालांकि अफगानिस्तान में लगातार दूसरे साल आर्थिक विकास दर्ज किया गया है, लेकिन 2025 में वास्तविक जीडीपी में केवल 1.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो पिछले वर्ष के 2.3 प्रतिशत से कम है। वहीं, जनसंख्या वृद्धि की दर 6.5 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जिसके परिणामस्वरूप प्रति व्यक्ति वास्तविक जीडीपी में अनुमानित 2.1 प्रतिशत की गिरावट आई है।