अमेरिका और बहु-ध्रुवीयता: ब्रिक्स+ और एससीओ की नई चुनौतियाँ
अमेरिका का वर्चस्व और बहु-ध्रुवीयता की चुनौतियाँ
अमेरिका का प्रयास है कि वह वैश्विक मुद्दों पर अपना वर्चस्व बनाए रखे, जबकि दूसरी ओर बहु-ध्रुवीयता की दिशा में बढ़ने वाले देशों के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। इस स्थिति का तनाव ब्रिक्स+ और एससीओ के सदस्यों पर स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है, जो हाल तक इस दिशा में आगे बढ़ रहे थे।
शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का 26वां शिखर सम्मेलन 31 अगस्त से 1 सितंबर तक किर्गिजिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित हुआ। इसके बाद, 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में ब्रिक्स+ शिखर सम्मेलन होने वाला है। ये दोनों मंच अक्सर एक साथ चर्चा में आते हैं, क्योंकि इन्हें नई विश्व व्यवस्था का प्रतीक माना जाता था। हालांकि, इनकी स्थापना का उद्देश्य ऐसा नहीं था। 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण के बाद, इन मंचों से नई उम्मीदें जुड़ गईं।
हालांकि, अब स्थिति यह है कि इन संभावनाओं पर संदेह और सवाल उठने लगे हैं। ट्रंप प्रशासन के दौरान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अमेरिका द्वारा दी गई चुनौती ने वैश्विक अस्थिरता को बढ़ा दिया है। अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करने में अनिच्छा दिखाई है, जिससे अन्य देशों को अपनी भूमिका फिर से निर्धारित करने की आवश्यकता महसूस हो रही है।
यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि यह बात इन मंचों के महत्व को कम करने के लिए नहीं कही जा रही है। बल्कि यह समझने के लिए है कि ब्रिक्स+ और एससीओ के सामने नई चुनौतियाँ क्या हैं? क्या ये मंच ग्लोबल साउथ के देशों को पश्चिमी वर्चस्व से बाहर निकलने का माध्यम बन सकते हैं? और क्या विकासशील देशों के शासक वर्ग वास्तव में ऐसा करने के लिए इच्छुक हैं?
ट्रंप प्रशासन के दौरान जो वास्तविकताएँ सामने आईं, उन्होंने इन सवालों को जन्म दिया है। जब अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय कानून और सहमति के प्रति अपनी निष्ठा को नकार दिया, तब कई देशों के शासक वर्ग ने अमेरिका के साथ संबंधों को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया। इस कारण, एससीओ और ब्रिक्स+ के बीच की दूरी बढ़ती जा रही है।
ग्लोबल साउथ के अधिकांश देशों का रुख जारी व्यवस्था और उसके विकल्पों की चर्चा में दोनों तरफ दांव लगाने का रहा है। भारत इस स्थिति का एक प्रमुख उदाहरण है। यूक्रेन युद्ध के बाद, अमेरिका ने रूस और चीन के खिलाफ एकजुटता दिखाई, लेकिन भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद जारी रखी। इसे भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' के रूप में देखा गया।
भविष्य में, ऊर्जा संबंधों के अलावा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकता है। जुलाई में चीन के शंघाई में हुए एआई शिखर सम्मेलन में 29 देशों ने WAICO (World Artificial Intelligence Cooperation Organization) के गठन पर हस्ताक्षर किए। इनमें से कई देश ब्राजील, इंडोनेशिया और कजाखस्तान अमेरिका के नेतृत्व वाले पैक्स सिलिका के सदस्य हैं।
अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि देशों को एआई तकनीक के मामले में किसी एक पक्ष को चुनना होगा। यह स्थिति ब्राजील, इंडोनेशिया और कजाखस्तान जैसे देशों के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय लेने की आवश्यकता को जन्म देती है।
इस प्रकार, अमेरिका और बहु-ध्रुवीयता की दिशा में बढ़ने वाले देशों के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। ब्रिक्स+ और एससीओ के सदस्य देशों को इस नई स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।
ब्रिक्स+ का 18वां वार्षिक शिखर सम्मेलन भारत द्वारा आयोजित किया जाएगा, जिसका विषय 'धीरज, नवाचार, सहयोग और निरंतरता के लिए निर्माण' है। यह विषय भावनात्मक है और इसका सीधा अर्थ है कि मेज़बान देश ने ठोस विषय रखने से बचने की कोशिश की है।
हाल के वर्षों में, ब्रिक्स+ ने नई मौद्रिक व्यवस्था की दिशा में कदम बढ़ाने का प्रयास किया है, जिसे 'डी-डॉलराइजेशन' कहा जाता है। 2024 में रूस में होने वाले शिखर सम्मेलन में 'ब्रिक्स क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट इनिशिएटिव' की शुरुआत की गई थी।
हालांकि, यह सवाल बना हुआ है कि क्या नरेंद्र मोदी सरकार इस प्रस्ताव को शिखर सम्मेलन के एजेंडे में महत्व देगी। डी-डॉलराइजेशन पर असहमति बनी रह सकती है। ब्रिक्स+ की मुश्किल यह है कि अध्यक्षता बदलने से प्राथमिकताएँ भी बदल जाती हैं।
सर्व-प्रमुख मुद्दा यह है कि कोई देश नई विश्व व्यवस्था की आवश्यकता को किस गहराई से महसूस करता है। अधिकांश देशों के शासक वर्गों ने अपने हित अमेरिका केंद्रित वैश्विक साम्राज्यवाद से गहराई से जोड़ रखे हैं।
अमेरिका ने वेनेजुएला और ईरान पर युद्ध छेड़कर अपने वैश्विक वर्चस्व को बढ़ाने का प्रयास किया है। इन युद्धों के माध्यम से अमेरिका ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह संप्रभुता आधारित विश्व व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता।
ब्रिक्स+ और एससीओ के सदस्य देशों की प्रतिक्रिया इन नई परिस्थितियों को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। उदाहरण के लिए, चीन ने अमेरिका के 'आर्थिक डी-डे' अभियान पर केवल एक राजनयिक आपत्ति नहीं की, बल्कि उसने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के संचालन के बारे में अपनी सोच को भी स्पष्ट किया।
चीन की प्रतिक्रिया अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद पर आधारित है। यह 'कानून-आधारित विश्व व्यवस्था' की भाषा है।
अमेरिका का रुख एक अलग अवधारणा पर आधारित है, जिसमें वह नियमों को स्वयं बनाता है और उन्हें लागू करता है। जब चीन ऐसे प्रतिबंधों पर आपत्ति जताता है, तो वह अमेरिकी धारणा को खारिज करता है।
नई विश्व व्यवस्था की आवश्यकता को समझना महत्वपूर्ण है। क्या विभिन्न देशों के लिए नियम सार्वभौमिक होंगे, या वे इस पर निर्भर करेंगे कि उन्हें परिभाषित और लागू करने की ताकत किसके पास है? ट्रंप काल में अमेरिका ने ताकत के सिद्धांत की वकालत की है।
इस प्रकार, ब्रिक्स+ और एससीओ को नई भूमिका ग्रहण करनी चाहिए थी। लेकिन चूंकि इनके सदस्य अनेक देशों के शासक वर्ग comprador की भूमिका में हैं, इसलिए नई परिस्थिति इन देश-समूहों के लिए नई चुनौती बन गई है।