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अमेरिका की ईरान नीति में पाकिस्तान की भूमिका: एक नई कूटनीतिक रणनीति

अमेरिका ने ईरान के साथ तनाव को कम करने के लिए पाकिस्तान का सहारा लिया, जिससे एक नई कूटनीतिक रणनीति का खुलासा हुआ। रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान ने अमेरिका की शर्तें ईरान तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस प्रक्रिया में, पाकिस्तान के सेना प्रमुख ने अमेरिकी नेतृत्व के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा। जानिए इस कूटनीतिक खेल के पीछे की पूरी कहानी और इसके संभावित परिणाम।
 

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में पाकिस्तान की भूमिका

वॉशिंगटन: अंतरराष्ट्रीय राजनीति में केवल औपचारिक वार्ताएं ही नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे चलने वाली 'शांत कूटनीति' भी महत्वपूर्ण निर्णयों को प्रभावित करती है। हाल ही में, अमेरिका ने ईरान के साथ तनाव को कम करने के लिए पाकिस्तान का सहारा लिया। लंदन स्थित एक समाचार पत्र की रिपोर्ट के अनुसार, व्हाइट हाउस ने सीधे संवाद करने के बजाय इस्लामाबाद के माध्यम से तेहरान तक अपनी बात पहुंचाई।


अमेरिका ने पाकिस्तान को एक संदेशवाहक के रूप में इस्तेमाल किया, ताकि वह अपनी शर्तें और प्रस्ताव ईरान तक पहुंचा सके। यह रणनीति संभवतः इस विचार पर आधारित थी कि एक मुस्लिम बहुल पड़ोसी देश के माध्यम से भेजा गया संदेश ईरान के लिए अधिक स्वीकार्य हो सकता है। हालांकि, इस प्रक्रिया ने पाकिस्तान की कूटनीतिक स्वतंत्रता पर सवाल उठाए हैं।


कई हफ्तों तक चले इस गोपनीय कूटनीतिक खेल का खुलासा हो रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने ईरान को संघर्ष विराम के लिए मनाने की जिम्मेदारी पाकिस्तान को सौंपी थी, और इस्लामाबाद ने एक महत्वपूर्ण 'बैक-चैनल' के रूप में कार्य किया। अमेरिका चाहता था कि ईरान होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने और लड़ाई रोकने के लिए तैयार हो जाए।


इस प्रयास की अगुवाई पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने की। उन्होंने अमेरिकी नेतृत्व के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा। समयसीमा के नजदीक आने पर मुनीर ने राष्ट्रपति ट्रंप, उपराष्ट्रपति और विशेष दूत से सीधे बातचीत की। इस दौरान पाकिस्तानी अधिकारी वॉशिंगटन और तेहरान के बीच प्रस्तावों का आदान-प्रदान करते रहे।


सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान ने अमेरिका की ओर से तैयार 15-सूत्रीय योजना ईरान तक पहुंचाई, जबकि तेहरान ने 5 और 10 बिंदुओं वाले जवाबी प्रस्ताव भी अमेरिका को भेजे। लगातार बैक-चैनल बातचीत के बाद, ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम के कुछ पहलुओं पर सीमित रियायत देने के लिए तैयार होता नजर आया।


आखिरकार, इन कूटनीतिक प्रयासों का परिणाम दो हफ्तों के युद्धविराम के रूप में सामने आया, जिसकी घोषणा अमेरिका, ईरान और इजरायल ने की। हालांकि, इस दौरान ट्रंप की सार्वजनिक बयानबाजी काफी सख्त रही और उन्होंने चेतावनी दी कि शर्तें न मानने पर ईरान को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।


एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान का सार्वजनिक रुख भी अमेरिका के साथ मेल खाता रहा। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ द्वारा ट्रंप की समयसीमा बढ़ाने की अपील वाला सोशल मीडिया पोस्ट व्हाइट हाउस की मंजूरी के बाद ही जारी किया गया था।


यह पोस्ट उस समय आया जब ट्रंप की तय डेडलाइन करीब थी और पाकिस्तान दोनों पक्षों के लिए एक 'एग्जिट रास्ता' तैयार करने की कोशिश कर रहा था। इससे यह संकेत मिलता है कि पर्दे के पीछे कूटनीतिक तालमेल कहीं ज्यादा गहरा था, जबकि सार्वजनिक मंचों पर बयानबाजी अलग अंदाज में जारी रही।