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अमेरिकी चुनावी डेटा पर साइबर हमलों का खतरा: ट्रंप प्रशासन की चेतावनी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें देश के मतदाता पंजीकरण डेटाबेस पर विदेशी साइबर हमलों के खतरे की चेतावनी दी गई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले एक दशक में अमेरिका के सभी 50 राज्यों के चुनावी सिस्टम को हैक करने की कोशिश की गई है। ट्रंप ने कहा कि यह डेटा चोरी होने पर इसके दुरुपयोग की संभावना है, जो चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। जानें इस रिपोर्ट में और क्या जानकारी दी गई है और इसके संभावित प्रभाव क्या हो सकते हैं।
 

चुनाव सुरक्षा पर गंभीर चिंता

वाशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने हाल ही में जारी किए गए गोपनीय खुफिया और साइबर सुरक्षा आकलनों में चेतावनी दी है कि देश के मतदाता पंजीकरण डेटाबेस विदेशी साइबर हमलों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बने हुए हैं। यदि यह डेटा चोरी होता है, तो इसका दुरुपयोग कई वर्षों तक किया जा सकता है।


ट्रंप के चुनावी सुरक्षा पर दिए गए बयान के बाद जारी इन दस्तावेजों में बताया गया है कि मतदाता पंजीकरण डेटाबेस विदेशी खुफिया एजेंसियों और साइबर हमलावरों के लिए एक प्रमुख लक्ष्य हैं। इनका उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया में बाधा डालना और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास कमजोर करना हो सकता है।


व्हाइट हाउस द्वारा जारी अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (डीएचएस) की रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले एक दशक में अमेरिका के सभी 50 राज्यों के मतदाता पंजीकरण सिस्टम को हैक करने की कोशिश की गई। इनमें से कम से कम 20 राज्यों में साइबर हमलावरों ने सफलतापूर्वक सेंध लगाई।


रिपोर्ट में कहा गया है, "राज्य स्तर के मतदाता पंजीकरण डेटाबेस विदेशी विरोधी देशों के लिए अत्यधिक आकर्षक लक्ष्य हैं।" इसमें यह भी चेतावनी दी गई है कि मतदाताओं की संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी लीक होने का खतरा केवल चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके प्रभाव लंबे समय तक रह सकते हैं।


रिपोर्ट के अनुसार, चोरी किए गए मतदाता डेटा का उपयोग डाक मतपत्र के लिए फर्जी आवेदन करने, मतदाता पंजीकरण रिकॉर्ड में बदलाव करने, मतदान केंद्र बदलने या मतदाता का नाम सूची से हटाने जैसे कार्यों में किया जा सकता है।


इस आकलन रिपोर्ट में 2016 के बाद से चुनावी ढांचे पर हुए कई साइबर हमलों का भी उल्लेख किया गया है। इनमें रूस की वोटर रजिस्ट्रेशन डेटाबेस की जांच करने की कोशिशें, ईरान का वोटर रजिस्ट्रेशन की जानकारी हासिल करने का प्रयास और चीन की संदिग्ध साइबर गतिविधियां शामिल हैं।


राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने संबोधन में कहा कि हाल ही में सार्वजनिक किए गए खुफिया दस्तावेज यह साबित करते हैं कि अमेरिका लंबे समय से जानता था कि उसकी चुनावी व्यवस्था विदेशी साइबर खतरों के संपर्क में है।


उन्होंने बताया कि खुफिया एजेंसियों ने मतदाता पंजीकरण डेटाबेस, इलेक्ट्रॉनिक पोल बुक और आधिकारिक चुनावी वेबसाइटों को सबसे अधिक जोखिम वाले सिस्टम के रूप में चिह्नित किया है।


डीएचएस की रिपोर्ट में राज्य और स्थानीय चुनाव अधिकारियों को साइबर सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कई सुझाव दिए गए हैं। इनमें मतदाता डेटाबेस का नियमित ऑफलाइन बैकअप, मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन का व्यापक उपयोग, नेटवर्क को अलग-अलग हिस्सों में बांटना, इंटरनेट से जुड़े सिस्टम की लगातार निगरानी और किसी भी साइबर हमले से निपटने के लिए व्यापक योजना तैयार करना शामिल है।


रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बैंकों, स्वास्थ्य सेवाओं और क्रेडिट रिपोर्टिंग एजेंसियों जैसी निजी कंपनियों के पास मौजूद व्यक्तिगत डेटा में बड़ी सेंध भी चुनावी सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है, क्योंकि इसी तरह की व्यक्तिगत जानकारी का उपयोग मतदाताओं की पहचान सत्यापित करने और डाक मतपत्र जारी करने में किया जाता है।


ट्रंप ने बताया कि उनका प्रशासन संभावित साइबर कमजोरियों से प्रभावित राज्यों के राज्यपालों, सांसदों और चुनाव अधिकारियों को सूचना देना शुरू कर चुका है। अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग अगले वर्ष होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले राज्यों के साथ मिलकर इन तकनीकी कमजोरियों को दूर करेगा।


हालांकि, रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि अब तक ऐसा कोई निष्कर्ष नहीं निकला है कि इन साइबर हमलों ने किसी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के परिणाम को बदला हो। फिर भी रिपोर्ट में कहा गया है कि विदेशी देशों की बढ़ती साइबर क्षमताओं को देखते हुए मतदाता पंजीकरण डेटाबेस की सुरक्षा अब अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल हो गई है।