अमेरिकी चुनावों में ट्रंप का प्रभाव और भारत की राजनीति का समानांतर
अमेरिकी चुनावों की विशेषताएँ
अमेरिका के मध्यावधि चुनावों में एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि यह चुनाव भारत के चुनावी ढंग से काफी मेल खा रहा था। चुनाव से पहले, ट्रंप ने प्रवासियों के खिलाफ कदम उठाने शुरू कर दिए थे। मतदाता पहचान पत्र की अनिवार्यता की मांग उठाई जा रही थी। कई राज्यों में परिसीमन की प्रक्रिया चल रही थी, जो भारत में भी देखने को मिल रही है। चुनाव जीतने पर हर अमेरिकी को पांच हजार डॉलर देने का वादा किया गया, जो भारत में चुनावी रणनीतियों की तरह ही था। इलॉन मस्क ने भी हर बच्चे को अपनी कंपनी स्पेसएक्स का एक शेयर देने का प्रस्ताव रखा।
आक्रामक इमिग्रेशन नीतियाँ
इमिग्रेशन एंड कस्टम एन्फोर्समेंट (ICE) के माध्यम से बाहरी लोगों को निकालने की नीति को आक्रामक तरीके से लागू किया गया। अमेरिका में भी 'हम और वे' का विभाजन किया जा रहा था, जैसे भारत में 80-20 का चुनावी समीकरण बनाने की कोशिश की जा रही है। विपक्ष के पास कोई चेहरा नहीं होने का नैरेटिव भी बनाया गया। ट्रंप के मुकाबले डेमोक्रेटिक पार्टी के पास कोई प्रभावी नेता नहीं था।
डेमोक्रेटिक पार्टी की चुनौतियाँ
जो बाइडेन, जो 2024 के चुनाव में भाग ले रहे थे, बीमार और अशक्त हो गए थे। उनके पास कोई स्पष्ट नेतृत्व नहीं था। उप राष्ट्रपति कमला हैरिस ने चुनाव लड़ा, लेकिन हारने के बाद वे भी राजनीति से दूर हो गईं। इस प्रकार, 2020 से 2024 तक डेमोक्रेटिक पार्टी के चेहरे चुनाव में प्रासंगिक नहीं रहे।
भारत और अमेरिका की समानताएँ
भारत में भी बार-बार पूछा जाता है कि नरेंद्र मोदी के मुकाबले विपक्ष के पास कौन सा चेहरा है। अमेरिका में भी कोई विकल्प नहीं था, लेकिन चुनाव के समय कई नए चेहरे उभरे। लोगों ने ट्रंप को हराने का निर्णय लिया, जिससे चेहरे गौण हो गए। यह सोचने की बात है कि भारत में भी चेहरा कौन है और मोदी को चुनौती देने वाला कौन है।
जनता की नाराजगी
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की टिप्पणी के बाद जनता ने आंदोलन किया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि जनता को चेहरे से कोई मतलब नहीं है। आज भी विभिन्न मुद्दों पर जनता की नाराजगी अलग-अलग लोगों के नेतृत्व में हो रही है।