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अमेरिकी युद्ध नीति और आर्थिक संकट: एक गंभीर विश्लेषण

इस लेख में अमेरिकी युद्ध नीति और उसके आर्थिक प्रभावों का गहन विश्लेषण किया गया है। जानें कि कैसे ट्रंप प्रशासन की नीतियों ने अमेरिका की आंतरिक स्थिति को प्रभावित किया है और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता को उजागर किया है। क्या अमेरिका अपनी आर्थिक चुनौतियों का सामना कर पाएगा? पढ़ें पूरी जानकारी के लिए।
 

अमेरिकी युद्ध नीति का प्रभाव

तेल और गैस की कीमतें वैश्विक बाजार से प्रभावित होती हैं। अमेरिका में इन संसाधनों का स्वामित्व निजी कंपनियों के पास है। इसलिए, जब आपूर्ति में कमी आती है, तो इन कंपनियों का लाभ बढ़ता है, लेकिन इसका असर आम अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ता है। यह स्थिति गंभीर है, जिसके कारण ट्रंप ईरान के साथ युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता खोजने के लिए उत्सुक हैं। हालांकि, ईरान इस प्रक्रिया को सरल नहीं बना रहा है।


समाजशास्त्री नेल बोनिला ने हाल ही में कहा कि ‘पुरानी व्यवस्था अब व्यापक वैचारिक या राजनीतिक सहमति बनाने में असमर्थ होती जा रही है। जो सहमति बनती है, वह विखंडित रहती है।’ यह आलेख अमेरिकी वर्चस्व और वॉशिंगटन केंद्रित वैश्विक व्यवस्था के क्षय की प्रक्रिया पर आधारित है।


अमेरिका के हालिया युद्धों पर ध्यान दें, तो हम अक्सर सहमति की विखंडित स्थिति देख सकते हैं। उदाहरण के लिए, ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमले के संदर्भ में। यहां हम केवल अमेरिका के अंदर की स्थिति पर ध्यान केंद्रित करते हैं। 28 फरवरी को ईरान पर हमले के बाद, अमेरिका में किए गए जनमत सर्वेक्षणों ने एक समान निष्कर्ष निकाला: यह युद्ध अमेरिकी जनता के बीच बेहद अलोकप्रिय है।



  • डॉनल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के समर्थकों में युद्ध की लोकप्रियता 70 से 85 प्रतिशत के बीच बनी रही।

  • वहीं, विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के 80 से 90 प्रतिशत समर्थक इस युद्ध के खिलाफ हैं।

  • स्वतंत्र या निर्दलीय मतदाताओं में भी युद्ध के खिलाफ राय बनी हुई है, जो युद्ध के उद्देश्य में अस्पष्टता, अमेरिकी सैनिकों की संभावित हानि, और बढ़ती महंगाई के कारण चिंतित हैं।


इससे स्पष्ट है कि अमेरिकी जनता ट्रंप प्रशासन की युद्ध नीति पर विभाजित है। यह प्रतिक्रिया अमेरिका की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति को दर्शाती है। हालांकि, ऐसा हमेशा नहीं था। दस साल पहले, जब अमेरिका किसी युद्ध में शामिल होता था, तो वहां का शासक वर्ग उसके पक्ष में व्यापक सहमति बनाने में सफल रहता था।


इसका कारण अमेरिकी जनता की आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था से मोहभंग है। संदेश यह है कि जो व्यवस्था अपने नागरिकों की भलाई सुनिश्चित नहीं कर सकती, वह लंबे समय तक सहमति नहीं बना सकती।


दूसरे विश्व युद्ध के बाद, अमेरिकी जनता की वित्तीय स्थिति को लेकर निराशा पहले कभी नहीं देखी गई। हालिया सर्वेक्षणों में 54 प्रतिशत अमेरिकियों ने कहा है कि महंगाई के कारण उनकी वित्तीय स्थिति पिछले वर्ष की तुलना में खराब हुई है।


इस बीच, वॉल स्ट्रीट और मेन स्ट्रीट के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है। अमेरिकी उपभोक्ता मूड गिरकर 47.6 अंक पर आ गया है, जो आधुनिक इतिहास का सबसे निचला स्तर है।


हालांकि, अब वित्तीय बाजार की चमक भी धूमिल होती दिख रही है। ल्यूक ग्रोमेन, जो बांड और मौद्रिक बाजारों के विशेषज्ञ हैं, ने हाल ही में कहा कि अमेरिकी साम्राज्य के क्षय के कारण डॉलर अपनी आकर्षण खो रहा है।


ग्रोमेन के अनुसार, तीन दीर्घकालिक रुझान इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं: ब्रिक्स+ द्वारा किए गए धीमे संक्रमण, अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंध, और यह समझ कि अमेरिका अपने ऋण के बोझ को बिना भारी कटौती के नहीं संभाल सकता।


यह स्थिति इतनी गंभीर है कि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में परिवर्तन अपरिहार्य हो गया है। सर्गेई ग्लेज़येव, जो प्रमुख अर्थशास्त्री हैं, ने कहा कि दुनिया एक प्रणाली से दूसरी प्रणाली में संक्रमण कर रही है।


ट्रंप की युद्ध नीति ने अमेरिका को कमजोर किया है, यह केवल एक रूसी अर्थशास्त्री की राय नहीं है, बल्कि न्यूयॉर्क टाइम्स के संपादक मंडल ने भी इसे स्वीकार किया है। संपादकीय में कहा गया है कि ट्रंप के युद्धों ने अमेरिका को कई मोर्चों पर कमजोर किया है।



  • ईरान के प्रभाव में वृद्धि।

  • अमेरिका की सैनिक रुतबा में कमी।

  • अमेरिकी गठबंधन का विखंडन।

  • अमेरिका के नैतिक प्रभाव में गिरावट।


अंततः, यह स्पष्ट है कि अमेरिका की आर्थिक स्थिति और युद्ध नीति एक गंभीर मोड़ पर है। यदि कच्चे तेल की कीमतें 115 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाती हैं, तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में पड़ सकती है।


इस संदर्भ में, यह विचार अप्रासंगिक हो जाता है कि अमेरिका के पास तेल और गैस का पर्याप्त भंडार है। क्योंकि ये कीमतें वैश्विक बाजार से जुड़ी हैं। यही कारण है कि ट्रंप ईरान युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता खोज रहे हैं, लेकिन ईरान इसे आसान नहीं बना रहा है।