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असम में दिहाड़ी मजदूर की नागरिकता पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 15 दस्तावेजों के बावजूद नहीं मिली राहत

असम में एक दिहाड़ी मजदूर की नागरिकता को लेकर गुवाहाटी हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने 15 दस्तावेजों के बावजूद याचिका को खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि याचिकाकर्ता अपने दावे का समर्थन करने में असफल रहा। अदालत ने विदेशी न्यायाधिकरण के निर्णय को बरकरार रखा, जिसमें मजदूर को विदेशी घोषित किया गया था। इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए याचिकाकर्ता की पहचान को सार्वजनिक नहीं किया गया है। जानें इस मामले की पूरी जानकारी और अदालत के फैसले के पीछे के कारण।
 

असम में नागरिकता का मामला


नई दिल्ली: असम में एक दिहाड़ी मजदूर की भारतीय नागरिकता से संबंधित एक मामला सामने आया है, जिसमें वह गुवाहाटी हाईकोर्ट गया था। अदालत ने विदेशी न्यायाधिकरण के उस निर्णय को बरकरार रखा, जिसमें उसे विदेशी घोषित किया गया था। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता अपने दावे के समर्थन में कोई कानूनी और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका, जिससे उसकी भारतीय नागरिकता साबित हो सके। इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अदालत ने याचिकाकर्ता की पहचान को सार्वजनिक नहीं किया है, क्योंकि उसके पास अभी भी कानूनी विकल्प मौजूद हैं।


याचिका खारिज होने की तिथि

जानकारी के अनुसार, जस्टिस कल्याण राय सुराना और जस्टिस शमीमा जहां की खंडपीठ ने 30 जून को सुनवाई के बाद याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 9 का उल्लेख करते हुए कहा कि नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी याचिकाकर्ता की थी, लेकिन वह इस कानूनी दायित्व को पूरा नहीं कर सका। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि विदेशी न्यायाधिकरण ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही तरीके से मूल्यांकन किया था और उसके आदेश में किसी प्रकार की कानूनी या तथ्यात्मक गलती नहीं पाई गई।


याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज

याचिकाकर्ता ने अपने पक्ष में 15 दस्तावेज पेश किए थे, जिनमें 1951 की एनआरसी में पिता और दादा-दादी के नाम, 1966 से 2017 तक की विभिन्न मतदाता सूचियां, 1973 की भूमि रजिस्ट्री, 2017 का स्कूल प्रमाणपत्र, पैन कार्ड, वोटर आईडी और पिता की मौखिक गवाही शामिल थी। हालांकि, अदालत ने पाया कि इन दस्तावेजों के माध्यम से परिवार की वंशावली और नागरिकता का स्पष्ट संबंध स्थापित नहीं हो सका।


दस्तावेजों को स्वीकार करने से इनकार

कोर्ट ने 1951 की एनआरसी की प्रतियों को स्वीकार करने से भी इनकार कर दिया। अदालत के अनुसार, ये केवल कंप्यूटर से निकाली गई प्रतियां थीं, जिन्हें कानूनी रूप से प्रमाणित नहीं किया गया था। भारतीय साक्ष्य कानून के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत नहीं किया गया। स्कूल प्रमाणपत्र को इसलिए खारिज कर दिया गया क्योंकि न तो प्रधानाध्यापक को गवाह बनाया गया और न ही प्रवेश रजिस्टर पेश किया गया। 1973 की भूमि रजिस्ट्री भी नागरिकता साबित करने में सहायक नहीं रही, क्योंकि उत्तराधिकार और भूमि स्वामित्व का निरंतर रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पैन कार्ड और वोटर आईडी पहचान संबंधी दस्तावेज हो सकते हैं, लेकिन वे भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं हैं। मतदाता सूचियों में उम्र और पारिवारिक विवरण से जुड़ी कई असमानताएं भी सामने आईं। इन सभी तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने विदेशी न्यायाधिकरण का फैसला बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी।