आईडीबीआई बैंक की बिक्री: भारत के औद्योगिक विकास की गंभीर समस्या
आईडीबीआई बैंक की स्थिति
आईडीबीआई बैंक की कहानी एक गंभीर समस्या का प्रतीक है। इसे औद्योगिक और ढांचागत विकास के लिए पूंजी उपलब्ध कराने के उद्देश्य से स्थापित किया गया था, लेकिन अब यह अस्तित्व में नहीं है।
भारत में औद्योगिक विकास के लिए पूंजी की कमी को समझने के लिए आईडीबीआई बैंक एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। वर्तमान में इसे कनाडा की फेयरफैक्स कंपनी को बेचा जा रहा है। भारत सरकार ने इसकी 60.7 प्रतिशत हिस्सेदारी इस कंपनी को देने का निर्णय लिया है। इस बिक्री से सरकार को वित्तीय संकट से निपटने में मदद मिलेगी, लेकिन यह ध्यान देने योग्य है कि फेयरफैक्स के पास पहले से ही एक अन्य भारतीय बैंक- सीबीएस में 40 प्रतिशत हिस्सेदारी है।
भारतीय रिजर्व बैंक के नियमों के अनुसार, एक ही समूह को दो बैंकों में इतनी बड़ी हिस्सेदारी रखने की अनुमति नहीं है। हालांकि, इस समस्या का समाधान निकाला जा सकता है।
रिपोर्टों के अनुसार, रिजर्व बैंक फेयरफैक्स को सीबीएस का विलय करने या उसमें अपनी हिस्सेदारी बेचने के लिए दो साल का समय दे सकता है। कुछ विशेषज्ञों ने बैंकों के विदेशी स्वामित्व पर भी सवाल उठाए हैं, इसे देश के रणनीतिक हितों के खिलाफ बताया गया है। बिक्री की अनुमति में कुछ प्रक्रियागत खामियों की ओर भी इशारा किया गया है।
ये सभी चिंताएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आईडीबीआई की कहानी एक और गंभीर समस्या को उजागर करती है। आईसीआईसीआई और आईडीबीआई बैंकों को दीर्घकालिक औद्योगिक एवं ढांचागत विकास के लिए पूंजी उपलब्ध कराने के लिए स्थापित किया गया था। इस प्रकार की फाइनेंसिंग में जोखिम अधिक होता है, इसलिए सामान्य बैंक इससे बचते हैं। यही कारण है कि 'डेवलपमेंट बैंकिंग' प्रणाली की आवश्यकता महसूस की जाती है।
हालांकि, उदारीकरण के दौर में आत्म-निर्भर विकास को पिछड़ी धारणा माना जाने लगा। इसके परिणामस्वरूप, 2002 और 2004 में इन दोनों बैंकों को कॉमर्शियल बैंक में परिवर्तित कर दिया गया। इसके बाद से भारत में कोई डेवलपमेंट बैंक नहीं रह गया।
इसका परिणाम यह हुआ कि लघु और मझौले व्यवसायों के लिए वित्त की कमी हो गई है, जो शेयर बाजार से पूंजी नहीं जुटा सकते। इसके चलते नए निजी निगमों के विकास का मार्ग अवरुद्ध हो गया है। अब आईडीबीआई का स्वामित्व विदेशी हाथों में जा रहा है, जिससे इसे पहले की स्थिति में लाना असंभव हो जाएगा। जबकि वैश्विक स्तर पर आत्म-निर्भरता की ओर लौटने का रुझान है, यह निर्णय भारत की दिशा में एक उलटफेर का प्रतीक है।