आपातकाल की 51वीं वर्षगांठ: भारत के इतिहास का काला अध्याय
आपातकाल की घोषणा और उसके प्रभाव
1977 में जनता पार्टी की सरकार का गठन
51 Years of Emergency in the country, नई दिल्ली: 25 जून 1975 की रात को, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्देश पर, राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने आपातकाल की घोषणा की। यह घोषणा उस समय हुई जब अधिकांश लोग गहरी नींद में थे।
सुबह जब लोग जागे, तो उनकी जिंदगी में एक बड़ा बदलाव आ चुका था। इसे भारत के इतिहास का सबसे अंधकारमय समय माना जाता है। इस दौरान कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटित हुईं। आपातकाल के दौरान अनेक लोगों को गिरफ्तार किया गया और उन्हें जेल में डाल दिया गया। प्रेस पर कड़ी सेंसरशिप लागू की गई, जिससे बिना सरकारी अनुमति के कुछ भी प्रकाशित नहीं किया जा सकता था। लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन किया गया।
इंदिरा गांधी का आपातकाल लगाने का तर्क
इंदिरा गांधी ने 26 जून 1975 को आकाशवाणी पर अपने संबोधन में आपातकाल के कारणों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि देश में कुछ शक्तियां अस्थिरता पैदा कर रही हैं और यह सरकार के निर्णय लेने में बाधा डाल रही हैं। उन्होंने इसे देश की सुरक्षा के लिए आवश्यक बताया। हालांकि, विपक्षी दलों और कई लोगों ने इसे लोकतंत्र पर हमला करार दिया।
आपातकाल के बाद कांग्रेस की हार
आपातकाल के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस पार्टी को हार का सामना करना पड़ा और जनता पार्टी की सरकार बनी। इस सरकार ने आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों की जांच के लिए एक आयोग का गठन किया। यह समय भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद दौर था, जिसने देश की राजनीति और समाज पर गहरा प्रभाव डाला।
चुनाव की घोषणा और आपातकाल का अंत
इंदिरा गांधी ने 18 जनवरी 1977 को नए चुनाव कराने की घोषणा की और सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया। इसके दो दिन बाद, 20 जनवरी 1977 को लोकसभा को भंग कर दिया गया। यह लोकसभा लगभग छह साल तक कार्यशील रही। बाद में हुए चुनाव में इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी को हार का सामना करना पड़ा। 21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त कर दिया गया और मोरारजी देसाई ने जनता पार्टी के नेतृत्व में प्रधानमंत्री का पद संभाला।