इलाहाबाद हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: प्रेम संबंध का अंत नहीं है अपराध
प्रेम संबंधों पर महत्वपूर्ण निर्णय
नई दिल्ली: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आपसी सहमति से बने संबंधों और विवाह के वादे को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने कहा कि हर प्रेम संबंध का अंत शादी में होना आवश्यक नहीं है। कई कारण हो सकते हैं, जैसे विचारों में भिन्नता या प्राथमिकताओं का बदलना, जिनकी वजह से रिश्ते समाप्त हो सकते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी रिश्ते का समाप्त होना आपराधिक मामला नहीं है और इसे कानून के माध्यम से साबित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट का निर्णय
रिश्ता टूटना कोई अपराध नहीं
यह निर्णय जस्टिस विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने प्रयागराज के कर्नलगंज थाने से जुड़े एक मामले में आरोपी संजय सरोज की याचिका पर सुनाया। अदालत ने आरोपी के खिलाफ चल रहे बलात्कार (धारा 376) और अन्य आपराधिक धाराओं के मुकदमे को रद्द कर दिया।
वयस्कों की जिम्मेदारी
वयस्कों को परिणामों की समझ होना जरूरी
अपने 34 पन्नों के विस्तृत फैसले में, उच्च न्यायालय ने वयस्कों के बीच सहमति से बने संबंधों पर गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि दो वयस्कों के बीच लंबे समय तक सहमति से बने शारीरिक संबंध को बलात्कार नहीं माना जा सकता, यदि बाद में शादी का वादा पूरा नहीं हुआ। यदि एक शिक्षित और समझदार महिला अपने निर्णयों के परिणामों को जानती है, तो यह नहीं कहा जा सकता कि उसकी सहमति धोखे में ली गई थी। अदालत ने इस तरह के मामलों को संवेदनशीलता से देखने की आवश्यकता बताई।
एफआईआर का उद्देश्य
दबाव बनाने के लिए दर्ज कराई गई थी FIR
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, शिकायतकर्ता महिला 2014 में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए प्रयागराज आई थी। वहां उसके रिश्तेदार संजय ने उसकी मदद की, जिसके बाद दोनों के बीच प्रेम संबंध बने। 2019 में, महिला ने आरोप लगाया कि युवक ने शादी का झूठा वादा कर शारीरिक संबंध बनाए और उसे ब्लैकमेल किया। अदालत ने पाया कि एफआईआर दर्ज होने के बाद पीड़िता ने आरोपी से शादी कर ली थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह एफआईआर युवक पर शादी का दबाव बनाने के लिए दर्ज की गई थी।
न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग
न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग: हाई कोर्ट
हाई कोर्ट ने मामले की समीक्षा के बाद पाया कि दोनों के बीच संबंध पूरी तरह से आपसी सहमति पर आधारित थे, इसलिए बलात्कार का कोई अपराध नहीं बनता। अदालत ने इसे 'दुर्लभ से दुर्लभतम' मामलों में रखा, जहां आपराधिक कार्यवाही जारी रखना समय की बर्बादी और न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। अदालत ने इस मामले को खारिज करते हुए आरोपी को राहत दी और स्पष्ट किया कि प्रेम संबंध का टूटना कानूनी अपराध नहीं है।