इलाहाबाद हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: सामाजिक कार्यकर्ता को रासुका से मिली राहत
हाई कोर्ट का निर्णय
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) का आरोप लगाना एक दमनकारी कदम था। न्यायालय ने यह भी बताया कि नोएडा प्रशासन को पता था कि चौधरी की गिरफ्तारी का आधार कानूनी रूप से कमजोर है, इसलिए उन्हें जमानत मिलने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए थी। इस स्थिति से बचने के लिए, बिना किसी ठोस साक्ष्य के उन पर रासुका लगाया गया। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने न केवल रासुका को रद्द किया, बल्कि नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम की व्यक्तिगत जिम्मेदारी भी तय की है।
कोर्ट ने चौधरी के संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए उन्हें पांच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है, जो रूपम की तनख्वाह से काटा जाएगा। इस निर्णय से नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हनन की प्रवृत्ति पर रोक लग सकती है। आकृति चौधरी को नोएडा में मजदूर आंदोलन के दौरान गिरफ्तार किया गया था, जहां उन्होंने आम लोगों से मजदूरों के समर्थन में खड़े होने का आह्वान किया था। पुलिस ने इसे 'राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा' बताया।
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है, और उन्हें निराधार आशंकाओं के आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने निर्देश दिया कि इस मामले में दोषी अधिकारियों की सेवा पुस्तिका में कोर्ट की नाराजगी दर्ज की जाए।
न्यायाधीशों ने नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों को यह याद दिलाया कि उनकी वफादारी भारत के संविधान के प्रति होनी चाहिए, न कि सत्ताधारियों की राजनीति के प्रति। जब सत्ता पक्ष के राजनीतिक हित और प्रशासनिक अधिकारियों के व्यवहार के बीच का अंतर मिटता जा रहा है, तो न्यायपालिका की यह टिप्पणी एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप मानी जाएगी। कोर्ट ने कहा कि इस तरह का तानाशाही और असंवैधानिक रवैया 'ऑरवेलियन डिस्टोपिया' की धारणा को साकार कर सकता है।