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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आकृति चौधरी की हिरासत को किया रद्द

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आकृति चौधरी की हिरासत को रद्द कर दिया है, जो कि लगभग पांच महीने से जेल में थीं। कोर्ट ने कहा कि उनकी हिरासत का कोई ठोस आधार नहीं था और राज्य ने उनके खिलाफ मनगढ़ंत कहानी बनाई थी। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने निर्देश दिया कि यदि किसी अन्य मामले में गिरफ्तारी की आवश्यकता नहीं है, तो उन्हें तुरंत रिहा किया जाए। इस मामले में पुलिस द्वारा आरोप साबित करने में असफलता और वीडियो फुटेज की कमी भी सामने आई है। जानें इस मामले की पूरी जानकारी।
 

हिरासत रद्द करने का आदेश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बुधवार को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत आकृति चौधरी की हिरासत को समाप्त कर दिया है। आकृति, जो दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक हैं, को अप्रैल 2026 में नोएडा में हुए श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन के मामले में लगभग पांच महीने से हिरासत में रखा गया था।


कोर्ट ने कहा हिरासत का कोई आधार नहीं

हाई कोर्ट की एक बेंच ने उनकी हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि हिरासत का कोई ठोस आधार नहीं था। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने कहा कि किसी अन्य मामले में गिरफ्तारी उचित नहीं है और उन्हें तुरंत रिहा किया जाना चाहिए।


'राज्य ने गढ़ी मनगढ़ंत कहानी'

आकृति चौधरी, जो 25 वर्ष की हैं, को नोएडा में मजदूरों के विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामले में लगभग पांच महीने से जेल में रखा गया था। जस्टिस श्रीधरन और जस्टिस सचदेव की बेंच ने उनकी बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि राज्य ने उनके खिलाफ एक मनगढ़ंत कहानी बनाई थी।


कोर्ट का तत्काल रिहाई का निर्देश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि किसी अन्य मामले में गिरफ्तारी की आवश्यकता नहीं है, तो आकृति को तुरंत रिहा किया जाए। विस्तृत आदेश अभी आना बाकी है। कोर्ट ने गिरफ्तारी और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNS) के तहत नोटिस जारी करने की प्रक्रिया की गहन जांच की।


पुलिस आरोप साबित करने में असफल

राज्य ने बताया कि आकृति को 12 अप्रैल 2026 को सुबह 10:56 बजे गिरफ्तार किया गया और उन्हें BNS की धारा 130 का नोटिस दिया गया। राज्य का आरोप था कि उन्होंने भीड़ को आगजनी और पत्थरबाजी के लिए उकसाया। जस्टिस श्रीधरन ने पूछा कि क्या पहले धारा 126 का नोटिस दिया गया था, जिस पर राज्य सरकार ने कहा कि नहीं, केवल धारा 130 का नोटिस जारी किया गया।


गिरफ्तारी से पहले नोटिस का अभाव

बेंच ने यह भी नोट किया कि BNS के अनुसार धारा 130 से पहले धारा 126 की प्रक्रिया आनी चाहिए। जस्टिस श्रीधरन ने जनरल डायरी (GD) एंट्री को देखते हुए कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि नोटिस जारी करने से पहले ही गिरफ्तारी हो चुकी थी।


हिंसा से पहले हुई गिरफ्तारी?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि यदि नोटिस पहले दिया गया होता, तो जीडी नंबर नहीं होता या वह हाथ से लिखा होता। राज्य सरकार ने दावा किया कि 11 अप्रैल को लोग विरोध के लिए इकट्ठा हुए थे, लेकिन कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि उस दिन कोई हिंसा नहीं हुई थी और जो हिंसा हुई, वह आकृति की गिरफ्तारी के बाद की थी।


वीडियो फुटेज की कमी

मंगलवार को भी कोर्ट ने राज्य से वीडियो फुटेज मांगा था जिसमें आकृति पत्थरबाजी या गाड़ी जलाने के लिए उकसाती दिखें। उत्तर प्रदेश सरकार ने हाई कोर्ट से समय मांगा, लेकिन बेंच ने इनकार कर दिया क्योंकि आकृति पहले ही 5 महीने जेल में बिता चुकी थीं।


आकृति चौधरी की गिरफ्तारी का कारण

चार्जशीट दाखिल होने के बाद भी कोर्ट ने गवाहों के बयानों और वीडियो में आकृति के नाम या भूमिका के बारे में सवाल उठाए। आकृति चौधरी को नोएडा मजदूरों के विरोध से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया था। उत्तर प्रदेश पुलिस ने 13 मई को आकृति और पत्रकार सत्यम वर्मा के खिलाफ NSA लगाया था। गौतम बुद्ध नगर पुलिस कमिश्नर ने उस समय मजबूत इलेक्ट्रॉनिक और वीडियो सबूतों का दावा किया था। आकृति ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी, और अब उन्हें राहत मिली है।