इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: यूपी में तानाशाही का खतरा
इलाहाबाद हाईकोर्ट की चेतावनी
लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अधिकारियों के कार्यशैली पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने चेतावनी दी है कि यदि यूपी सरकार के अधिकारी इसी तरह तानाशाही रवैया अपनाते रहे, तो राज्य एक 'ऑर्वेलियन डिस्टोपिया' में बदल जाएगा, जहां सरकार का पूर्ण नियंत्रण होगा और नागरिकों को स्वतंत्रता नहीं मिलेगी।
अदालत ने यह टिप्पणी केवल अफसरशाही के संदर्भ में नहीं की, बल्कि नोएडा की कलेक्टर मेधा रूपम और अन्य अधिकारियों के कार्यों पर भी ध्यान केंद्रित किया। हाईकोर्ट ने हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय की कानून की छात्रा और सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी की रासुका के तहत गिरफ्तारी को रद्द करते हुए, नोएडा की कलेक्टर द्वारा हिरासत के आदेश की कड़ी आलोचना की।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने कहा कि आकृति चौधरी की हिरासत ने अनुच्छेद 21 के तहत उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया है, क्योंकि हिरासत का आदेश ठोस सबूतों पर आधारित नहीं था और इसे बिना उचित विचार के जारी किया गया। कोर्ट ने चौधरी को पांच लाख रुपए का मुआवज़ा देने का आदेश दिया, जो गौतम बुद्ध नगर की कलेक्टर मेधा रूपम और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों की सैलरी से वसूला जाएगा।
अपने 15 पृष्ठों के आदेश में, बेंच ने अफसरशाही और पुलिस की भूमिका पर कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ की हैं। कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों को नागरिकों के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की रक्षा करने की जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन उन्हें यह याद रखना चाहिए कि उनकी निष्ठा संविधान के प्रति होनी चाहिए, न कि सरकार के प्रति। कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकारी जनता के सेवक होते हैं, और लोकतंत्र में जनता ही मालिक होती है।