ईरान के खिलाफ संघर्ष से भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का असर
शुरुआत में यह उम्मीद की गई थी कि अमेरिका और इजराइल के बीच ईरान के खिलाफ संघर्ष जल्दी समाप्त हो जाएगा। लेकिन अब यह स्थिति लंबे समय तक चलने की ओर बढ़ रही है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था में चिंता की लकीरें गहरी हो गई हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रही थी, और अब पश्चिम एशिया में शुरू हुए इस नए युद्ध ने गंभीर समस्याएं उत्पन्न कर दी हैं। ईरान द्वारा होरमुज जलडमरूमध्य को बंद करने के कारण, पहले दो दिनों में ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 10-12 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है। इसके परिणामस्वरूप, भारत को हर बैरल तेल के लिए अधिक डॉलर खर्च करने होंगे। अच्छी बात यह है कि भारत के पास लगभग 750 बिलियन डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है, जिससे वह महंगे आयात को जारी रख सकता है।
हालांकि, आयात पर बढ़ते डॉलर खर्च का असर रुपये की कीमत पर पड़ेगा, जो पहले से ही प्रति डॉलर 90 रुपये के स्तर से ऊपर है। रुपये की कीमत में गिरावट के साथ, आयात और महंगा हो जाएगा। इस बीच, रूस से सस्ते तेल की खरीद एक विकल्प हो सकता है, लेकिन इससे अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता में जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसके अलावा, प्राकृतिक गैस की आपूर्ति भी इस युद्ध के कारण प्रभावित हो सकती है, क्योंकि लगभग 20 प्रतिशत एलएनजी की सप्लाई होरमुज से होकर गुजरती है।
इसलिए, इन आपूर्ति बाधित होने की संभावनाएं वास्तविक हैं। यदि ऐसा होता है, तो उर्वरक उत्पादन भी बुरी तरह प्रभावित होगा, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतों में वृद्धि के संकेत मिल रहे हैं। पश्चिम एशिया के समुद्री मार्ग पर बढ़ती चिंताओं के बीच, अमेरिका और यूरोप को होने वाले भारतीय निर्यात का एक बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, पहले दो दिनों में कई निर्यात ऑर्डर स्थगित कर दिए गए हैं। शुरुआत में यह उम्मीद थी कि ईरान के खिलाफ संघर्ष जल्दी समाप्त होगा, लेकिन अब यह स्थिति लंबे समय तक चलने की ओर बढ़ रही है, जिससे अर्थव्यवस्था में चिंता की लकीरें गहरी हो गई हैं।