ईरान में आंदोलन और भारत में एक्स मुस्लिम विमर्श का उभार
ईरान में धार्मिक पहचान पर उठते सवाल
नई दिल्ली: ईरान में महंगाई और शासन के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों ने अब केवल राजनीतिक विरोध का रूप नहीं लिया है, बल्कि यह धार्मिक पहचान और आस्था पर भी सवाल खड़ा कर रहा है। इस संदर्भ में 'एक्स मुस्लिम' मुहिम को नई ऊर्जा मिलती दिखाई दे रही है। भारत में भी इस बदलाव की गूंज सुनाई देने लगी है। हालाँकि, दोनों देशों की परिस्थितियाँ भिन्न हैं, लेकिन धर्म, पहचान और स्वतंत्रता के मुद्दों पर समानताएँ देखी जा रही हैं।
ईरान में इस्लामिक शासन के खिलाफ आंदोलन
ईरान में चल रहा आंदोलन धीरे-धीरे इस्लामिक शासन के खिलाफ एक व्यापक विरोध में बदलता जा रहा है। कई लोग इसे बाहरी प्रभाव मानते हैं और अपनी सांस्कृतिक पहचान को पारसी धर्म से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। वहां इस्लाम के प्रति अनिच्छा अब खुलकर सामने आ रही है। प्रदर्शन अब केवल महंगाई या प्रशासन के खिलाफ नहीं, बल्कि धार्मिक व्यवस्था पर भी सवाल उठाने लगे हैं।
भारत में इंटरनेट पर विमर्श का विस्तार
भारत में एक्स मुस्लिम से संबंधित विमर्श मुख्यतः इंटरनेट मीडिया तक सीमित है। एक्स, यूट्यूब, फेसबुक और व्हाट्सऐप जैसे प्लेटफार्मों पर लोग अपने अनुभव साझा कर रहे हैं। हालांकि, परिवार और समाज की प्रतिक्रिया का डर अभी भी बना हुआ है, लेकिन कुछ लोग हिम्मत दिखा रहे हैं और सार्वजनिक मंचों पर अपनी पहचान को उजागर कर रहे हैं।
दिल्ली में नाम बदलने की घोषणा
हाल ही में दिल्ली के रामलीला मैदान में आर्य समाज के एक कार्यक्रम में इमरोज आलम ने मंच से अपना नाम राजन चौधरी रखने की घोषणा की। उन्होंने खुद को एक्स मुस्लिम बताया। उनके जैसे कई अन्य लोग भी दावा कर रहे हैं कि देश में एक्स मुस्लिमों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, हालांकि इन आंकड़ों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है। फिर भी, यह मुहिम अब उत्तर भारत तक पहुंच चुकी है।
धर्म परिवर्तन की व्यक्तिगत कहानियाँ
चंडीगढ़ के जावेद इकबाल ने कुछ महीने पहले हिंदू धर्म अपनाकर अपना नाम जीतेंद्र गौड़ रखा। उन्होंने अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ सनातन धर्म ग्रहण किया। जावेद का कहना है कि उन्होंने वर्षों तक दोनों धर्मों का अध्ययन किया। कट्टरता, महिलाओं की स्थिति और सवाल पूछने की स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर विचार करने के बाद उन्होंने यह निर्णय लिया। यह यात्रा आसान नहीं थी, लेकिन उनके बच्चों ने इसे सहजता से स्वीकार किया।
सामाजिक चुनौतियाँ और सवाल
सनातन धर्म अपनाने के बाद भी चुनौतियाँ समाप्त नहीं होतीं। इमरोज आलम बताते हैं कि कई स्थानों पर उन्हें पूर्व में मुस्लिम होने के कारण घर खरीदने में कठिनाई होती है। बच्चों के विवाह को लेकर भी चिंता बनी रहती है। धार्मिक संगठनों का मानना है कि जैसे-जैसे संख्या बढ़ेगी, ये समस्याएँ कम होंगी। यह बदलाव केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी नए सवाल खड़े कर रहा है।