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उच्चतम न्यायालय ने ग्रेटर नोएडा के छात्र को नोटिस जारी करने पर उठाए सवाल

उच्चतम न्यायालय ने ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा एक छात्र को नोटिस जारी करने के मामले में सवाल उठाए हैं। न्यायालय ने कहा कि जब पहले ही संबंधित एफआईआर रद्द की जा चुकी थीं, तो ऐसा नोटिस जारी नहीं किया जाना चाहिए था। वरिष्ठ अधिवक्ता ने इस मामले को न्यायालय में प्रस्तुत किया, जिसमें छात्र को शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने का निर्देश दिया गया था। जानें इस मामले की पूरी जानकारी और न्यायालय के निर्देशों के बारे में।
 

उच्चतम न्यायालय का निर्णय


उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा जारी किए गए नोटिस पर सवाल उठाया। यह नोटिस 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के प्रस्तावित छात्र विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रचार कर रहे एक छात्र को 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' की धारा 130 के तहत जारी किया गया था।


न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि जब पहले ही विरोध प्रदर्शन से संबंधित एफआईआर रद्द की जा चुकी थीं और निर्देश दिया गया था कि छात्रों के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की जाए, तो ऐसे नोटिस का जारी होना उचित नहीं था।


वरिष्ठ अधिवक्ता विश्वजीत भट्टाचार्य ने यह मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के समक्ष प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के एक छात्र को नोटिस जारी कर शांति बनाए रखने के लिए पांच लाख रुपये का निजी बॉन्ड भरने का निर्देश दिया था, जिसे बाद में वापस ले लिया गया।


न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने यह सवाल उठाया कि उच्चतम न्यायालय के पहले के निर्देशों के बावजूद, मजिस्ट्रेट ने कैसे ऐसा नोटिस जारी किया। अदालत ने अधिवक्ता से नोटिस को रिकॉर्ड में रखने और अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगने का निर्देश दिया।


बीएनएसएस की धारा 126 और 135 के तहत चार सितंबर को जारी नोटिस में आरोप लगाया गया था कि छात्र अक्षत त्रिपाठी दूसरों को सीजेपी के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उकसा रहे थे, जिससे शांति भंग हो सकती थी।