उत्तराखंड में SC/ST छात्रवृत्ति घोटाले में ईडी की बड़ी कार्रवाई, 13.83 करोड़ की संपत्ति अटैच
ईडी की कार्रवाई का विवरण
उत्तराखंड: प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए एससी-एसटी छात्रवृत्ति घोटाले की जांच के तहत लगभग 13.83 करोड़ रुपये की चल और अचल संपत्ति को अस्थायी रूप से अटैच किया है। यह कार्रवाई ईडी के देहरादून सब जोनल ऑफिस द्वारा की गई है।
यह ध्यान देने योग्य है कि उत्तराखंड में SC/ST स्कॉलरशिप घोटाले की जांच 2020 से चल रही है। अब तक, ईडी ने विशेष अदालत PMLA (Prevention of Money Laundering Act) में 05 अभियोजन शिकायतें दायर की हैं और 05 प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर (PAO) जारी किए हैं।
ED, Dehradun Sub Zonal Office has provisionally attached movable and immovable properties worth Rs. 13.83 Crore (approx.) under PMLA, 2002 in connection with the ongoing investigation into the SC/ST Scholarship Scam in Uttarakhand. The SC/ST Scholarship Scam investigation has… pic.twitter.com/Xr5bfiF8B4
— ED (@dir_ed) June 15, 2026
उत्तराखंड पुलिस ने 2011-12 से 2016-17 के बीच अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप में धोखाधड़ी के मामले में मुकदमा दर्ज किया था, जिसके बाद यह मामला ईडी के पास पहुंचा।
ईडी ने पीएमएलए के तहत जांच की, जिसमें पता चला कि कई निजी शिक्षण संस्थानों ने छात्रवृत्ति में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की है। इन संस्थानों के लोगों ने समाज कल्याण विभाग से मिलने वाली छात्रवृत्ति को धोखाधड़ी से प्राप्त किया। चौंकाने वाली बात यह है कि फर्जी और अयोग्य छात्रों को भी छात्रवृत्ति का लाभार्थी बताया गया।
ईडी की जांच में 6,208 छात्रवृत्ति दावों में से 2,895 दावे फर्जी पाए गए। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि अनुपस्थित 668 छात्रों को 3,85,70,640 रुपये की राशि वितरित की गई।
इसी तरह, असफल और परीक्षा फॉर्म नहीं भरने वाले 84 छात्रों को 33,65,120 रुपये की राशि वितरित की गई। विश्वविद्यालय में रजिस्टर्ड नहीं होने वाले 1,662 छात्रों को 7,34,31,400 रुपये की छात्रवृत्ति बांटने का रिकॉर्ड दिखाया गया।
ईडी के अनुसार, इस समेकित आंकड़े में हर छात्र को केवल एक बार गिना गया है, चाहे उन्हें कई वर्षों में या ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरीकों से छात्रवृत्ति मिली हो।
जांच में यह भी सामने आया कि कॉलेज प्रबंधन और स्टाफ के नियंत्रण में छात्रों के नाम पर बैंक खाते खोले गए थे। कई छात्रों के खातों के लिए कॉलेज के कर्मचारियों के सामान्य मोबाइल नंबर का उपयोग किया गया। छात्रवृत्ति की राशि बाद में संस्थानों को वापस ट्रांसफर कर दी गई या नकद में निकाल ली गई, जिससे कल्याण योजना का उद्देश्य ही समाप्त हो गया।