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एथेनॉल का स्वास्थ्य पर प्रभाव: गाड़ियों से लेकर लोगों तक

एथेनॉल का उपयोग अब केवल वाहनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव डाल रहा है। गाड़ियों से निकलने वाले धुएं में खतरनाक गैसें होती हैं, जो स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं। इसके अलावा, एथेनॉल उत्पादन से निकलने वाला गंदा पानी जल प्रदूषण का कारण बन रहा है। जानें कैसे एथेनॉल का उत्पादन और उपयोग पर्यावरण और स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है, और बर्नीहाट जैसे क्षेत्रों में इसके गंभीर परिणाम क्या हैं।
 

एथेनॉल का बढ़ता प्रभाव

नई दिल्ली। एथेनॉल अब केवल वाहनों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह लोगों के जीवन पर भी गहरा असर डाल रहा है। एथेनॉल से चलने वाली गाड़ियों से निकलने वाले धुएं में खतरनाक गैसें होती हैं, जो मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं। इसके अलावा, एथेनॉल उत्पादन करने वाली फैक्ट्रियों से निकलने वाला गंदा पानी यदि नदियों में छोड़ा जाए, तो यह जल में ऑक्सीजन की कमी कर देता है, जिससे भूजल प्रदूषित हो जाता है। यह स्थिति जलीय जीवन और कृषि पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती है। साथ ही, एथेनॉल के उत्पादन में पानी की खपत भी बढ़ रही है, जो भविष्य में गंभीर संकट का कारण बन सकती है।


प्रदूषण की रेड कैटेगरी में एथेनॉल प्लांट

‘रेड कैटेगरी’ में रखे जाते हैं उद्योग
एथेनॉल उत्पादन करने वाले कारखाने प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों की रेड कैटेगरी में आते हैं। इनका प्रदूषण स्कोर 60 से अधिक होता है। एथेनॉल कारखानों से निकलने वाले हानिकारक उत्सर्जन जैसे एसिटाल्डिहाइड, फॉर्मेल्डिहाइड और एक्रोलिन हवा, पानी और मिट्टी को प्रदूषित करते हैं, जिससे स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा उत्पन्न होता है।


गाड़ियों पर एथेनॉल का नकारात्मक प्रभाव

पेट्रोल में एथेनॉल ​मिलने से गाड़ियां हो रहीं खराब
लोगों की सेहत के साथ-साथ गाड़ियों पर भी एथेनॉल का प्रभाव स्पष्ट हो रहा है। पेट्रोल में एथेनॉल की मिलावट के कारण गाड़ियों की गति में कमी आई है और माइलेज पर भी नकारात्मक असर पड़ा है। पहले जो वाहन 20 किमी/लीटर का माइलेज देते थे, अब ई20 फ्यूल के कारण यह घटकर 12 से 13 किमी/लीटर रह गया है।


पर्यावरणविदों की चिंताएं

पर्यावरणविदों ने क्या कहा?
पर्यावरणविदों ने इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि बायोफ्यूल वाहनों से उत्सर्जन को कम कर सकते हैं, लेकिन एथेनॉल का उत्पादन स्वयं में बहुत अधिक प्रदूषणकारी हो सकता है। यदि इसे नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह कृषि, जल की उपलब्धता और सार्वजनिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है।


बर्नीहाट: प्रदूषण का केंद्र

बर्नीहाट बना सबसे ज्यादा प्रदूषित
मेघालय और असम की सीमा पर स्थित बर्नीहाट वर्तमान में प्रदूषण की चपेट में है। यहां के निवासियों की सेहत पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। 1990 के दशक के अंत में औद्योगिकीकरण के कारण यह क्षेत्र पूर्वोत्तर भारत के प्रमुख औद्योगिक केंद्रों में बदल गया। आईक्यू एयर नामक एक स्विस संस्था ने इसे दुनिया के सबसे प्रदूषित मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किया है।


प्रदूषण के कारण स्वास्थ्य समस्याएं

लोगों को हो रही कई बीमारियां
बर्नीहाट में प्रदूषण के कारण स्थानीय लोगों को कई स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जैसे सांस लेने में कठिनाई और त्वचा संबंधी रोग। हालांकि, हाल के महीनों में प्रदूषण में कमी आने का दावा किया गया है।