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एफसीआरए बिल पर केंद्र सरकार की रणनीति: क्या है असली मकसद?

केंद्र सरकार द्वारा एफसीआरए बिल में बदलाव की कोशिशें और इसके पीछे की रणनीति पर चर्चा हो रही है। इस बिल के विवादास्पद प्रावधानों से ईसाई मिशनरियों में नाराजगी है। क्या यह सब अमेरिका के दबाव में हो रहा है? जानें इस मुद्दे की गहराई और इसके राजनीतिक प्रभावों के बारे में।
 

एफसीआरए बिल का संदर्भ


केंद्र सरकार द्वारा विदेशी चंदे के कानून, एफसीआरए में बदलाव का प्रस्ताव समझना आसान है, लेकिन इसके पीछे की रणनीति जटिल है। मार्च में संसद के बजट सत्र के दौरान इस बिल को पेश किया गया, लेकिन बाद में इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। इसके पीछे का कारण बताया गया कि केरल में विधानसभा चुनाव हैं और भाजपा को ईसाई वोटों की उम्मीद है। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईसाई समुदाय के साथ संवाद बढ़ाने के लिए कई प्रयास किए।


हालांकि, केरल चुनाव में भाजपा को कोई लाभ नहीं मिला, जिसके बाद मानसून सत्र में एफसीआरए बिल पर चर्चा फिर से शुरू हुई। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इस बिल पर चर्चा में शामिल होने की उम्मीद थी, लेकिन वह सदन में उपस्थित नहीं हुए। सरकार ने इस बिल को संयुक्त संसदीय समिति में भेजने का प्रस्ताव रखा, जिसे लोकसभा ने मंजूरी दी। यह सवाल उठता है कि क्या सरकार इस बिल का उपयोग विपक्षी दलों और ईसाई संगठनों को उलझाए रखने के लिए कर रही है।


अमेरिका का दबाव और एफसीआरए बिल

हाल ही में अमेरिका के उप राष्ट्रपति जेडी वेंस ने प्रधानमंत्री मोदी से फोन पर बात की थी, जिससे यह कयास लगाए जा रहे हैं कि एफसीआरए बिल को टालने के पीछे अमेरिकी दबाव हो सकता है। कुछ पत्रकारों ने इस बात को उठाया है कि मोदी सरकार ने अमेरिका के दबाव में कई फैसले लिए हैं।


हालांकि, यह समझना जरूरी है कि एफसीआरए बिल का मुद्दा आंतरिक राजनीति से जुड़ा है। भारत में यह धारणा है कि विदेशी चंदा प्राप्त करने वाली संस्थाएं देश के खिलाफ काम करती हैं। इसलिए, मोदी सरकार ने इस बिल को पेश किया, लेकिन इसे बार-बार टाला जा रहा है।


बिल के विवादास्पद प्रावधान

इस बिल में कुछ ऐसे प्रावधान शामिल हैं, जिनसे ईसाई मिशनरियों में नाराजगी है। 14,000 से अधिक गैर सरकारी संगठनों के एफसीआरए लाइसेंस पहले ही समाप्त हो चुके हैं। ईसाई मिशनरियों का कहना है कि यदि उनका लाइसेंस रिन्यू नहीं होता है, तो सरकार उनकी संपत्ति जब्त कर सकती है।


गैर सरकारी संगठन इसे एक कठोर कानून मानते हैं, जो उनके कामकाज को प्रभावित कर सकता है। यदि किसी संगठन ने विदेशी और घरेलू दोनों चंदों से ऑफिस बनाया है, तो उस ऑफिस को कैसे जब्त किया जा सकता है? यह सवाल भी उठता है कि सरकार ने इस बिल को पेश करने का निर्णय क्यों लिया।