कर्नाटक हाईकोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय: SC-ST आरक्षण में वृद्धि असंवैधानिक
कर्नाटक में आरक्षण पर महत्वपूर्ण फैसला
बेंगलुरु: कर्नाटक हाईकोर्ट ने सोमवार को आरक्षण के मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। अदालत ने राज्य में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण बढ़ाने वाले 2022 के कानून के मुख्य प्रावधानों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत का उल्लंघन करना असंवैधानिक है। इस निर्णय ने पूर्व भाजपा सरकार द्वारा कुल आरक्षण को 50 से बढ़ाकर 56 प्रतिशत करने के प्रयास को एक बड़ा झटका दिया है।
संविधान के अनुच्छेदों का उल्लंघन
अनुच्छेद 14, 15 और 16 का उल्लंघन, कोर्ट ने निरस्त कीं धारा 3 और 4
मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और जस्टिस के. एस. हेमलेखा की खंडपीठ ने कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली दो याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अधिनियम की धारा-3 और धारा-4 को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों में दाखिले से संबंधित धारा-3, कुल आरक्षण को 50 प्रतिशत से अधिक ले जाकर संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 15 का उल्लंघन करती है। इसी तरह, सरकारी सेवाओं में आरक्षण बढ़ाने से जुड़ी धारा-4 को भी असंवैधानिक करार दिया गया है।
इंदिरा साहनी केस का संदर्भ
इंदिरा साहनी केस की नजीर, 50 फीसदी की लक्ष्मण रेखा बरकरार
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के 1992 के ऐतिहासिक 'इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार' मामले का उल्लेख किया। इस फैसले में आरक्षण के लिए 50 प्रतिशत की अधिकतम सीमा निर्धारित की गई थी, जिसे बाद में कई अन्य मामलों में भी मान्यता दी गई। कर्नाटक सरकार के इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं में इसी कानूनी नजीर का हवाला दिया गया था। पूर्व मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई की भाजपा सरकार ने इस कानून के तहत अनुसूचित जाति का आरक्षण 15 से बढ़ाकर 17 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति का आरक्षण 3 से बढ़ाकर 7 प्रतिशत किया था।
सामाजिक न्याय पर प्रभाव
सामाजिक न्याय पर पड़ेगा असर, डिप्टी सीएम ने पूर्व सरकार को घेरा
कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे गंभीर और संवेदनशील मामला बताया। उन्होंने कहा कि SC-ST आरक्षण में वृद्धि रद्द होने का राज्य में सामाजिक न्याय, शैक्षणिक अवसरों और युवाओं की सरकारी नौकरियों पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। डिप्टी सीएम ने कहा कि सरकार न्यायपालिका और संविधान का सम्मान करती है, लेकिन इस निर्णय ने पूर्व भाजपा सरकार की राजनीतिक जवाबदेही पर सवाल उठाए हैं। राज्य सरकार अब इस कानूनी झटके के बाद अगले कदमों और सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की संभावनाओं पर विचार कर रही है।