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किताबों की पढ़ाई में गिरावट: रील्स का प्रभाव और वैश्विक स्थिति

आज के डिजिटल युग में किताबों की पढ़ाई में गिरावट एक गंभीर मुद्दा बन गई है। कई देशों में लोग साल में तीन किताबें भी नहीं पढ़ पाते, जबकि भारत में स्थिति थोड़ी बेहतर है। जानें कैसे रील्स और स्मार्टफोन ने पढ़ने की आदत को प्रभावित किया है और इसके पीछे के कारण क्या हैं। क्या आने वाली पीढ़ियां केवल स्क्रीन पर उंगलियां चलाना सीखेंगी? इस लेख में जानें किताबों और पढ़ाई की वर्तमान स्थिति के बारे में।
 

किताबें: इंसान की सबसे अच्छी दोस्त

नई दिल्ली: किताबें हमेशा से मानवता की सबसे करीबी साथी मानी जाती हैं, जो न केवल हंसाने और रुलाने का काम करती हैं, बल्कि जीवन के महत्वपूर्ण पाठ भी सिखाती हैं। लेकिन आज के डिजिटल युग में, प्रसिद्ध शायर गुलजार की पंक्तियाँ, 'किताबें झांकती हैं बंद अलमारी के शीशों से...' एक कड़वी सच्चाई बन गई हैं। जब दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मंगल ग्रह पर बसने की बात कर रही है, तब एक बड़ा वर्ग किताबों से पूरी तरह दूर हो चुका है। कई देशों में तो स्थिति इतनी गंभीर है कि लाइब्रेरी के दरवाजों पर ताले लटक रहे हैं और मोबाइल की स्क्रीन ने किताबों के पन्नों की जगह ले ली है।


किताबें पढ़ने की आदत में गिरावट

साल में 3 किताबें भी नहीं पढ़ पाते इन देशों के लोग


यह केवल पाठ्य पुस्तकों की बात नहीं है, बल्कि शौक के लिए पढ़ने की आदत भी प्रभावित हुई है। वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू के आंकड़ों के अनुसार, कई देशों में किताबें पढ़ने की आदत खतरनाक स्तर तक गिर चुकी है। सबसे कम किताबें पढ़ने वाले देशों में अफगानिस्तान सबसे ऊपर है, जहां एक व्यक्ति साल में औसतन केवल 2.56 किताबें पढ़ता है। इसके बाद पाकिस्तान और सऊदी अरब (औसतन 2.6 किताबें) का स्थान है। आश्चर्य की बात यह है कि कतर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे समृद्ध देशों में भी एक व्यक्ति साल में औसतन तीन किताबें भी नहीं पढ़ पाता। इसके पीछे स्मार्टफोन के अलावा, कम साक्षरता दर और सामाजिक अशांति भी महत्वपूर्ण कारण हैं।


भारत और अमेरिका की स्थिति

भारत और अमेरिका का क्या है हाल?


किताबों के प्रति भारत का दृष्टिकोण थोड़ा अलग और दिलचस्प है। भारत को किताबें पढ़ने में समय बिताने के मामले में दुनिया में सबसे ऊपर माना जाता है, लेकिन किताबों की संख्या के मामले में हम अमेरिका से पीछे हैं। एक औसत भारतीय साल में लगभग 16 किताबें पढ़ता है और हफ्ते में करीब 10.7 घंटे (सालाना 352 घंटे) पढ़ने में लगाता है। वहीं, अमेरिका के लोग साल में औसतन 17 किताबें पढ़ते हैं और 357 घंटे पढ़ने में बिताते हैं। भारत में किताबों के प्रति यह गहरा जुड़ाव हमारी समृद्ध साहित्यिक विरासत और युवाओं में प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रति जुनून से आता है। हालांकि, हाल के सर्वेक्षण बताते हैं कि शहरों में बढ़ते स्क्रीन टाइम के कारण शौक से किताबें पढ़ने वालों की संख्या धीरे-धीरे घट रही है। अब छपी हुई किताबों की जगह किंडल, ई-बुक्स और ऑडियो बुक्स ने लेनी शुरू कर दी है।


डीप रीडिंग की आदत का संकट

रील्स ने छीनी 'डीप रीडिंग' की आदत, समाज पर मंडरा रहा खतरा


यूनेस्को का मानना है कि आज भी करोड़ों वयस्कों का बुनियादी साक्षरता से दूर होना केवल शिक्षा का नहीं, बल्कि विकास का संकट है। चाड, माली और दक्षिण सूडान जैसे देशों में हिंसक हालात और गरीबी ने किताबों को लोगों की पहुंच से दूर कर दिया है। इराक, कजाकिस्तान और अल्जीरिया जैसे देशों में लाइब्रेरी अब केवल ऐतिहासिक इमारतें बनकर रह गई हैं। विशेषज्ञों की चेतावनी है कि मनोरंजन के लिए यूट्यूब और इंस्टाग्राम रील्स की बढ़ती दीवानगी ने 'डीप रीडिंग' की आदत को लगभग समाप्त कर दिया है। लोग अब 300 पन्नों की किताब पढ़ने के बजाय 30 सेकंड का वीडियो देखना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की रिपोर्ट के अनुसार, जो समाज पढ़ना छोड़ देता है, वह बौद्धिक रूप से कंगाल हो जाता है और आसानी से फेक न्यूज या प्रोपेगैंडा का शिकार बन जाता है। यह स्पष्ट संकेत है कि अगर समय रहते किताबों से दोबारा संबंध नहीं जोड़ा गया, तो आने वाली पीढ़ियां केवल स्क्रीन पर उंगलियां चलाना ही सीखेंगी, सोचने-समझने में नहीं।