केंद्र का प्राइवेट अस्पतालों का बचाव: दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता
दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
केंद्र सरकार का प्राइवेट अस्पतालों का समर्थन करना दवाओं की ऊंची कीमतों के मामले में अजीब प्रतीत होता है। सरकार का कहना है कि अस्पतालों पर वित्तीय दबाव है, जिसके कारण वे अधिक शुल्क लेते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने निजी अस्पतालों द्वारा दवाओं की अधिक कीमत वसूलने की प्रवृत्ति को ‘डकैती’ करार दिया है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की बेंच ने यह भी कहा कि सरकार इस स्थिति को अनदेखा कर रही है। उन्होंने यह भी बताया कि राष्ट्रीय औषधि मूल्य-निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) पूरी तरह निष्क्रिय हो चुका है, जबकि यह आवश्यक दवाओं के मूल्य निर्धारण का कार्यभार संभालता है।
हाल ही की सुनवाई में एक उदाहरण सामने आया, जिसमें कीमोथेरेपी की एक दवा, जिसकी अधिकतम खुदरा कीमत (एमआरपी) लगभग 11,000 रुपये है, एक निजी अस्पताल ने 1,30,000 रुपये में बेची। इस पर न्यायालय ने सवाल उठाया कि क्या इसे इस तरह से चलने दिया जाना चाहिए। केंद्र का प्राइवेट अस्पतालों का समर्थन इस मामले में एक और चिंताजनक पहलू है।
अतिरिक्त सोलिसीटर जनरल ऐश्वर्य भाटी ने कहा कि केंद्र की नीति चिकित्सा के पूरे इकोसिस्टम को नियंत्रित न करने की है। सरकार ने यह तर्क भी दिया कि भारत में दवाओं की कीमतें वैश्विक स्तर पर सबसे कम हैं। जजों ने इस पर उचित सवाल उठाया कि भारत की प्रति व्यक्ति आय भी कई देशों से कम है। इस स्थिति में केंद्र से यह सवाल उठता है कि क्या वह आम जनता के हितों का प्रतिनिधित्व करता है या बड़े पूंजी समूहों का। इस मुद्दे पर व्यापक सार्वजनिक चर्चा की आवश्यकता है।