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केंद्र सरकार का नया निर्देश: वंदे मातरम पहले, फिर जन गण मन

केंद्र सरकार ने सभी राज्यों और केंद्रीय मंत्रालयों को निर्देश दिया है कि सरकारी कार्यक्रमों में 'वंदे मातरम' को पहले गाना होगा, उसके बाद 'जन गण मन' का प्रदर्शन किया जाएगा। गृह मंत्रालय ने इस नियम का पालन करने के लिए सख्त आदेश जारी किया है। इसके साथ ही, सरकार संसद में एक नया विधेयक लाने की योजना बना रही है, जिसमें वंदे मातरम का अपमान करने को दंडनीय अपराध माना जाएगा। इस विषय पर विभिन्न राजनीतिक और धार्मिक दृष्टिकोणों के बीच बहस जारी है। जानें इस मुद्दे के विभिन्न पहलुओं के बारे में।
 

सरकार का सख्त निर्देश

केंद्र सरकार ने सभी राज्यों और केंद्रीय मंत्रालयों को फिर से स्पष्ट निर्देश दिया है कि सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत का प्रदर्शन करते समय पहले 'वंदे मातरम' गाना या बजाना अनिवार्य होगा, इसके बाद 'जन गण मन' का प्रदर्शन किया जाएगा। गृह मंत्रालय ने 9 जुलाई को सभी राज्यों के मुख्य सचिवों और केंद्रीय मंत्रालयों के सचिवों को इस संबंध में पत्र भेजा है, जिसमें इस नियम का कड़ाई से पालन करने की बात कही गई है.


गाने का सही तरीका

केंद्र का यह आदेश है कि 'वंदे मातरम' और 'जन गण मन' को सही शब्दों, उच्चारण और लय के साथ गाया या बजाया जाए। फरवरी में भी सरकार ने निर्देश दिया था कि वंदे मातरम के सभी छह छंदों को गाना आवश्यक है, जो लगभग 3 मिनट 10 सेकंड का होता है। अब इस नियम को फिर से याद दिलाया गया है.


वंदे मातरम का महत्व

'वंदे मातरम' की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी, जो उनके उपन्यास 'आनंदमठ' का हिस्सा है। यह गीत भारत माता की आराधना का प्रतीक है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कांग्रेस ने इसके पहले दो छंदों को अपनाया था, और बाद में इसे राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया। वहीं, 'जन गण मन' की रचना रवींद्रनाथ टैगोर ने की थी.


नया कानून लाने की तैयारी

सरकार संसद के आगामी मानसून सत्र में एक विधेयक पेश करने की योजना बना रही है, जिसमें वंदे मातरम का अपमान करने या इसे गाने में बाधा डालने को दंडनीय अपराध माना जाएगा। राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 3 के तहत राष्ट्रगान, राष्ट्रध्वज और संविधान का अपमान करने पर तीन साल तक की सजा हो सकती है. सरकार चाहती है कि सभी संस्थाएं और संगठन इन निर्देशों का पालन करें.


वंदे मातरम बनाम जन गण मन

संवैधानिक मामलों की विशेषज्ञ और सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रुपाली पंवार का कहना है कि 'वंदे मातरम' और 'जन गण मन' दोनों ही महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अलग-अलग संदर्भों में। यह बहस राजनीतिक और भावनात्मक है, न कि संवैधानिक। जन गण मन पर किसी को आपत्ति नहीं है, जबकि वंदे मातरम को कुछ आलोचक सेक्युलर विचारधारा के खिलाफ मानते हैं.


बहस का इतिहास

दीवान लॉ कॉलेज के सहायक प्रोफेसर निखिल गुप्ता बताते हैं कि 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने जन गण मन को राष्ट्रगान और वंदे मातरम को राष्ट्रगीत घोषित किया था। अब सरकार का कहना है कि यह मूल भावना थी, जिसे कानूनी रूप दिया जा रहा है, लेकिन सेक्युलर वर्ग को वंदे मातरम पर आपत्ति है.


आलोचना का स्वर

मुस्लिम नेताओं जैसे असदुद्दीन ओवैसी और अबू आजमी का कहना है कि वे वंदे मातरम का सम्मान करते हैं, लेकिन इसे नहीं गाएंगे। उनका धर्म उन्हें ईश्वर के अलावा किसी और की पूजा से रोकता है। ओवैसी ने कहा है कि अगर उन्हें किसी और की पूजा करने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह उनकी धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है.


सरकार की दृष्टि

कानूनी और संवैधानिक रूप से, आज भी जन गण मन भारत का राष्ट्रगान है और वंदे मातरम राष्ट्रगीत है। सरकार का कहना है कि नए नियम का उद्देश्य दोनों को समान सम्मान देना है, यह किसी को महान घोषित करने का मामला नहीं है.


सत्ता पक्ष की राय

आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कहा कि वंदे मातरम भारत की आत्मा की आवाज है। बीजेपी सांसद शशांक मणि ने कहा कि वंदे मातरम को कांग्रेस और पूर्ववर्ती सरकारों ने भुला दिया था, और अब इसे फिर से महत्व दिया जा रहा है.


वंदे मातरम और जन गण मन की बहस

वंदे मातरम मूल रूप से छह छंदों का है, जिसमें मातृभूमि की स्तुति की गई है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इसे खूब गाया गया। हालांकि, कुछ मुस्लिम नेताओं ने इसके बाद के छंदों पर आपत्ति जताई है। यह बहस आज भी जारी है कि क्या वंदे मातरम को कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाना चाहिए या नहीं.