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केरल विधानसभा के शपथ ग्रहण समारोह में विविधता और धर्मनिरपेक्षता की झलक

केरल की 16वीं विधानसभा का शपथ ग्रहण समारोह तिरुवनंतपुरम में आयोजित हुआ, जहां 42 विधायकों ने भगवान के नाम पर शपथ नहीं ली। इस समारोह में विभिन्न भाषाओं का उपयोग किया गया, जो राज्य की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है। मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन ने भी जातीय पहचान के साथ शपथ ली, जिससे राजनीतिक चर्चाएं फिर से शुरू हो गईं। जानें इस समारोह की खास बातें और केरल की राजनीति में इसके महत्व को।
 

केरल विधानसभा का शपथ ग्रहण समारोह


केरल की 16वीं विधानसभा का शपथ ग्रहण समारोह तिरुवनंतपुरम में गुरुवार को आयोजित हुआ। प्रोटेम स्पीकर जी. सुदाकरन ने सभी नवनिर्वाचित विधायकों को शपथ दिलाई। यह कार्यक्रम केवल एक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं था, बल्कि राज्य की राजनीतिक संस्कृति और विविधता का भी परिचायक रहा।


विधायकों ने लिया सोलम अफर्मेशन

इस समारोह में कई विधायकों ने भगवान के नाम पर शपथ लेने के बजाय 'सोलम अफर्मेशन' का विकल्प चुना। इस दौरान मलयालम, अंग्रेजी, तमिल और कन्नड़ जैसी विभिन्न भाषाओं का उपयोग किया गया, जो सदन की बहुभाषी पहचान को दर्शाता है।


42 विधायकों का अनोखा निर्णय

शपथ ग्रहण समारोह में सबसे अधिक चर्चा इस बात को लेकर हुई कि 42 विधायकों ने भगवान के नाम पर शपथ नहीं ली। इनमें वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) के कई विधायक शामिल थे। विपक्ष के नेता पिनराई विजयन, कांग्रेस के कुछ विधायक, आरएसपी और आरएमपीआई के सदस्य भी इस समूह में थे।


राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि केरल की राजनीति में लंबे समय से धर्मनिरपेक्षता और वैचारिक परंपरा का प्रभाव रहा है, जो इस समारोह में स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।


सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक

समारोह के दौरान विधायकों ने अपनी पहचान और सुविधा के अनुसार विभिन्न भाषाओं में शपथ ली। कुछ ने मलयालम में, तो कुछ ने अंग्रेजी, तमिल या कन्नड़ में शपथ ली। इससे विधानसभा की सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक प्रतिनिधित्व का संदेश मिला।


चुनावी प्रतिस्पर्धा के दौरान एक-दूसरे पर तीखे हमले करने वाले कई नेता समारोह के बाद एक-दूसरे से मुस्कुराते और बातचीत करते नजर आए। सदन के अंदर यह एक सकारात्मक माहौल था, जहां राजनीतिक विरोध के बावजूद सौहार्द दिखाई दिया।


मुख्यमंत्री का बयान

इस समारोह में मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन भी चर्चा का विषय बने। उन्होंने शपथ लेते समय अपना पूरा नाम लिया, जिसमें जातीय पहचान भी शामिल थी। इससे पहले भी इस मुद्दे पर सोशल मीडिया और कांग्रेस के कुछ वर्गों में बहस हुई थी।


हालांकि, मुख्यमंत्री ने आलोचनाओं को नजरअंदाज करते हुए विधानसभा में वही तरीका अपनाया। हाल ही में हुए चुनाव में कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ गठबंधन ने स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया, जबकि एलडीएफ को बड़ी हार का सामना करना पड़ा।