कॉमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमतों में अभूतपूर्व वृद्धि, आम जनता पर पड़ेगा असर
गैस सिलेंडर की कीमतों में भारी वृद्धि
एक मई, शुक्रवार को 19 किलो के कॉमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमत में 994 रुपए की अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई है। यह अब तक की सबसे बड़ी वृद्धि मानी जा रही है। इससे पहले मार्च और अप्रैल में भी कीमतों में बढ़ोतरी हुई थी, लेकिन उन दोनों में मिलाकर भी वृद्धि 200 रुपए से कम थी। इस बार एक बार में ही 994 रुपए की बढ़ोतरी हुई है, जिसके बाद दिल्ली में 19 किलो के कॉमर्शियल सिलेंडर की कीमत तीन हजार रुपए से अधिक हो गई है। कई अन्य शहरों में यह कीमत 3200 या 3300 रुपए से भी ज्यादा हो गई है। छोटे 5 किलो के सिलेंडर की कीमत में भी 250 रुपए से अधिक की वृद्धि की गई है.
सरकार की नीतियों पर सवाल
भारत में गैस संकट की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने पहले आपूर्ति में कमी की। कॉमर्शियल गैस की आपूर्ति को 70 प्रतिशत तक सीमित किया गया, जबकि पहले यह 30 प्रतिशत थी। इसे बाद में 50 और फिर 70 प्रतिशत तक बढ़ाया गया। यह भी ध्यान देने योग्य है कि सरकार ने पश्चिम बंगाल में चुनाव समाप्त होने का इंतजार किया और मतदान के एक दिन बाद ही कॉमर्शियल गैस की कीमतों में इतनी बड़ी वृद्धि की। घरेलू गैस की कीमतें बढ़ाने के बजाय, सरकार ने कॉमर्शियल गैस की कीमतें बढ़ाकर यह संदेश दिया कि वह जनता का ध्यान रख रही है, जबकि वास्तविकता कुछ और है.
आम जनता पर प्रभाव
कॉमर्शियल गैस की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर आम लोगों पर पड़ेगा। पहले से ही आपूर्ति में कमी और बढ़ती कीमतों के कारण छोटे रेस्तरां, ढाबे और होटल बंद हो रहे थे। कैंटीन का मेन्यू भी छोटा हो रहा था और खाने की चीजें महंगी हो रही थीं। इससे दिहाड़ी मजदूरों को अपने गांव लौटने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। गैस और तेल पर आधारित उद्योगों के बंद होने की खबरें आ रही हैं, जिससे लोगों की नौकरियां जा रही हैं या वेतन में कटौती हो रही है।
भविष्य की चुनौतियाँ
इस तरह की बड़ी बढ़ोतरी के बाद क्या स्थिति सामान्य रह पाएगी? कॉमर्शियल गैस की कीमतों में वृद्धि से दिहाड़ी मजदूरों, कम वेतन वाले पेशेवरों, निजी कंपनियों के कर्मचारियों और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों का जीवन और कठिन होगा। होटल, रेस्तरां, ढाबे और कैंटीन बंद होने की संभावना है, जिससे पलायन बढ़ेगा। इसके अलावा, छोटे और मध्यम उद्योगों पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, जिससे निर्माण गतिविधियां कम होंगी और नौकरियों में कमी आएगी.