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क्या यूसीसी भी जीएसटी की तरह होगा? जानिए इसके प्रभाव

समान नागरिक संहिता (यूसीसी) और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के बीच समानताएँ और भेदभाव की संभावनाएँ चर्चा का विषय बनी हुई हैं। क्या यूसीसी भी जीएसटी की तरह विभिन्न जातियों के लिए भेदभाव का कारण बनेगा? उत्तराखंड में लागू यूसीसी के प्रभाव और पश्चिम बंगाल में कुड़मी जाति को इसके दायरे से बाहर रखने के निर्णय पर विचार करें। क्या यह 'एक देश, एक कानून' के सिद्धांत को कमजोर करेगा? जानें इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर विस्तृत जानकारी।
 

यूसीसी और जीएसटी: समानता या भेदभाव?


क्या यूसीसी, यानी समान नागरिक संहिता, भी जीएसटी की तरह विभिन्न निजी कानूनों के साथ सह-अस्तित्व में रहेगा? हाल ही में यह चर्चा में है कि अनुसूचित जातियों के अलावा अन्य जातियों को भी यूसीसी के दायरे से बाहर रखा जा सकता है। नरेंद्र मोदी सरकार ने जीएसटी को 'एक देश, एक कर' के रूप में प्रस्तुत किया था, लेकिन क्या यह वास्तव में ऐसा है? वर्तमान में, आयकर और जीएसटी के अलावा भी कई अन्य करों का भुगतान करना पड़ता है। हाल ही में यूपीआई पर भी कर लगाया गया है, और टोल टैक्स तथा पेट्रोल-शराब पर अलग-अलग कर हैं।


यूसीसी को 'एक देश, एक कानून' के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन इसके कार्यान्वयन में भी जीएसटी जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। उत्तराखंड में सबसे पहले यह कानून लागू हुआ, जहां अनुसूचित जनजातियों को इससे बाहर रखा गया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जनजातियों को इस कानून के दायरे में नहीं लाया जाएगा।


पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने घोषणा की है कि उनके राज्य में कुड़मी जाति को भी यूसीसी से बाहर रखा जाएगा। यह निर्णय कुड़मी समुदाय की एसटी में शामिल होने की मांग के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। यदि कुड़मी को यूसीसी से बाहर रखा जाता है, तो अन्य राज्यों में भी इसी तरह की मांगें उठ सकती हैं।


यदि विभिन्न राज्यों में 10% या उससे अधिक आबादी यूसीसी से बाहर हो जाती है, तो 'एक देश, एक कानून' का सिद्धांत क्या रह जाएगा? यह एक गंभीर प्रश्न है जो इस कानून के प्रभाव को लेकर उठता है।