गताश्रम टीला: भगवान कृष्ण की लीलाओं का ऐतिहासिक स्थल
गताश्रम टीला का महत्व
गताश्रम टीला: भगवान कृष्ण की लीलाओं में भक्तों और भगवान के बीच मधुर संबंधों की अनेक कहानियाँ मिलती हैं। गोकुल, बरसाना, मथुरा और द्वारका में प्रभु ने कई लीलाएं की हैं। इन लीलाओं के प्रमाण आज भी कलयुग में देखे जा सकते हैं। इसी संदर्भ में मथुरा का गताश्रम टीला आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना पहले था।
गताश्रम टीला का ऐतिहासिक संदर्भ
गताश्रम टीला, मथुरा के विश्राम घाट के निकट स्थित एक प्राचीन और ऐतिहासिक स्थल है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध करने के बाद अपनी थकान दूर की थी। इसे गताश्रम नारायण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
विश्राम घाट का महत्व
गताश्रम टीला विश्राम घाट क्षेत्र में आता है, जहाँ मथुरा की परिक्रमा शुरू और समाप्त होती है। यहाँ की शाम की यमुना आरती बहुत प्रसिद्ध है। विश्राम घाट मथुरा जंक्शन से लगभग 4 किमी दूर है और यह भक्तों के लिए स्नान और पूजा का पवित्र स्थल है।
पौराणिक ग्रंथों में गताश्रम टीला
गताश्रम नारायण का मंदिर रामायण और महाभारत काल से संबंधित माना जाता है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण के लीलाओं के अवशेष माने जाते हैं। यह स्थान मथुरा के प्रसिद्ध टीलों में से एक है, जहाँ से भगवान श्रीकृष्ण से संबंधित पुरातात्विक अवशेष मिले हैं।
प्राचीन अवशेष और शिलापट
1917 में गताश्रम नारायण मंदिर क्षेत्र में खुदाई के दौरान एक प्राचीन शिलापट मिला था, जिसे भारत में श्रीकृष्ण के जन्म से संबंधित सबसे प्राचीन पुरातात्विक प्रमाणों में से एक माना जाता है।
इस शिलापट में वासुदेव जी द्वारा भगवान श्रीकृष्ण को टोकरी में ले जाते हुए दृश्य को उकेरा गया है। इसमें यमुना पार करते समय कालिया नाग से रक्षा करते हुए दिखाया गया है।
डॉ. एसपी सिंह (उपनिदेशक, राजकीय संग्रहालय मथुरा) के अनुसार, गताश्रम से प्राप्त प्रतिमाएं कुषाण काल की हैं और लगभग 2000 वर्ष से अधिक पुरानी हैं।
गताश्रम टीले से मिले एक अन्य शिलापट में गोवर्धनधारी कृष्ण (गोवर्धन पर्वत उठाए हुए) का दृश्य भी दर्शाया गया है, जो इस स्थान को भगवान कृष्ण की लीलाओं से सीधे जोड़ता है।