गर्भावस्था में एनीमिया: लक्षण और उपचार के उपाय
गर्भावस्था में एनीमिया की पहचान
नई दिल्ली: गर्भावस्था के दौरान कई महिलाएं कमजोरी, चक्कर आना, थकान और सांस फूलने जैसी समस्याओं का सामना करती हैं। यदि ये लक्षण लगातार बने रहें, तो यह एनीमिया का संकेत हो सकता है। एनीमिया, जो शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी के कारण होता है, गर्भवती महिला और उसके बच्चे दोनों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। यह न केवल महिलाओं को दैनिक कार्यों में थकान और कमजोरी का अनुभव कराता है, बल्कि बच्चे के विकास और वजन पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
एनीमिया के कारण
गर्भावस्था के दौरान एनीमिया का मुख्य कारण आयरन की कमी होती है। इस समय शरीर और प्लेसेंटा के विकास के लिए अधिक लाल रक्त कोशिकाओं की आवश्यकता होती है, जिससे आयरन की मांग बढ़ जाती है। यदि महिलाओं की डाइट में पर्याप्त आयरन नहीं है या पहले से ही उनके शरीर में आयरन की कमी है, तो एनीमिया होने की संभावना बढ़ जाती है। इसके अलावा, लगातार गर्भधारण, छोटे अंतराल पर गर्भधारण और उचित एंटी-नेटल देखभाल की कमी भी एनीमिया को बढ़ावा देती हैं।
एनीमिया के लक्षण
एनीमिया के कुछ सामान्य लक्षणों में लगातार थकान, चक्कर आना, सांस फूलना, धड़कन का तेज होना, त्वचा, होंठ और नाखूनों का पीला पड़ना, ठंडे हाथ-पैर, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई और चिड़चिड़ापन शामिल हैं। यदि हीमोग्लोबिन का स्तर 10.9 ग्राम/डीएल से कम हो, तो इसे गंभीर माना जाता है।
एनीमिया का उपचार
गर्भावस्था में एनीमिया से निपटने के लिए सही खानपान बेहद आवश्यक है। आयरन युक्त खाद्य पदार्थों को अपने आहार में शामिल करें, जैसे हरी पत्तेदार सब्जियां, सूखे मेवे, मूली के पत्ते और ड्रमस्टिक के पत्ते। इसके अलावा, अमरूद, खजूर, आंवला और अंकुरित अनाज भी फायदेमंद होते हैं। फोलिक एसिड युक्त खाद्य पदार्थ जैसे गेहूं, बीन्स और संतरे का सेवन भी करें। सब्जियों में गाजर, चुकंदर, कच्चा केला और फलों में सेब, अंगूर, चीकू, केला और अनार को शामिल करना भी लाभकारी होता है। आयुर्वेद में एनीमिया के लिए पुनर्नवादि मंडूर जैसी प्रभावी दवाएं भी उपलब्ध हैं।
डॉक्टर से कब संपर्क करें
हालांकि, यदि हीमोग्लोबिन का स्तर 7 ग्राम/डीएल से कम हो या एक महीने तक उपचार के बाद भी सुधार न हो, या महिला में कोई ब्लीडिंग डिसऑर्डर हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। एनीमिया केवल कमजोरी का कारण नहीं है, बल्कि यह मां और बच्चे दोनों के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है।