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गुरुद्वारों में दान की व्यवस्था: सुरक्षा और पारदर्शिता पर चर्चा

हाल के दिनों में मंदिरों में चढ़ावे और दान की चोरी के मामलों ने सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी और मथुरा के बांके बिहारी मंदिर में दानपेटी की रकम की गिनती के दौरान लाखों रुपये मिलने की घटनाओं ने धार्मिक संस्थानों में चंदे की सुरक्षा पर बहस को जन्म दिया है। इस लेख में गुरुद्वारों में दान की व्यवस्था, उसकी पारदर्शिता, और ऑडिट की प्रक्रिया पर चर्चा की गई है। जानें कि क्या गुरुद्वारों में भी दान चोरी की घटनाएं होती हैं और कैसे दान का हिसाब रखा जाता है।
 

मंदिरों में दान की चोरी पर सवाल

हाल के दिनों में देशभर में मंदिरों में चढ़ावे और दान की चोरी के मामलों ने सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी की घटना के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इस मुद्दे पर संसद में भी हंगामा हुआ है। इसी तरह, मथुरा के बांके बिहारी मंदिर में दानपेटी की रकम की गिनती के दौरान एक बैंक अधिकारी के पास से लाखों रुपये मिलने की घटना भी सामने आई है। इन घटनाओं ने धार्मिक संस्थानों में चंदे की सुरक्षा और उसके प्रबंधन पर बहस को जन्म दिया है। कई मंदिर अब चंदे की सुरक्षा को लेकर अधिक सतर्क हो गए हैं।


गुरुद्वारों में दान की व्यवस्था

गुरुद्वारों में दान की व्यवस्था हर जगह समान नहीं होती। विभिन्न गुरुद्वारा प्रबंधन समितियों के अपने नियम और प्रक्रियाएं होती हैं। हालांकि, बड़े गुरुद्वारों, विशेषकर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के अधीन आने वाले संस्थानों में दान, आय-व्यय, बैंक जमा, बजट और ऑडिट के लिए औपचारिक वित्तीय व्यवस्था मौजूद है। सिख गुरुद्वारों को 'सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1925' के तहत कानूनी मान्यता प्राप्त है, जिससे दान की व्यवस्था में आसानी होती है। SGPC हर साल अपना बजट पेश करती है, जिसमें विभिन्न विभागों और संस्थानों से होने वाली आय और खर्च का विस्तृत विवरण होता है।


पैसों की गिनती की प्रक्रिया

हाल ही में अयोध्या राम मंदिर में चंदा चोरी की घटना पैसों की गिनती के समय हुई थी। गुरुद्वारों में श्रद्धालु आमतौर पर जिस दानपेटी में पैसे डालते हैं, उसे गोलक कहा जाता है। गोलक से रकम निकालने और उसकी गिनती की प्रक्रिया संबंधित गुरुद्वारा प्रबंधन की निगरानी में होती है। यह व्यवस्था अयोध्या राम मंदिर में भी थी। चढ़ावे की गिनती और उसके बैंक में जमा होने की प्रक्रिया के बारे में SGPC प्रबंधन ने जानकारी दी है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि गोलक कितने दिनों में खोली जाती है। कुछ स्थानों पर स्थानीय व्यवस्था के अनुसार गोलक को निश्चित अंतराल पर खोला और गिना जाता है। कई बड़े गुरुद्वारों में गोलक रोज खोली जाती है और इसकी निगरानी की जाती है।


दान का हिसाब

सिख धर्म के सिद्धांतों के अनुसार, अपनी आय का 10वां हिस्सा गुरु के नाम पर दान करने का प्रावधान है। इसलिए, गुरुद्वारे की आमदनी केवल गोलक में डाले गए पैसों तक सीमित नहीं होती। श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए दान, विशेष परियोजनाओं के लिए मिलने वाली रकम, प्रसाद और दान के रूप में दी जाने वाली वस्तुएं भी आय का हिस्सा हो सकती हैं। SGPC की आधिकारिक वेबसाइट पर विदेश से दान भेजने वालों के लिए जानकारी देने की व्यवस्था है, जिसमें नाम, पता, मोबाइल नंबर, ईमेल, दान की रकम और बैंक में जमा करने की तारीख शामिल है। इसका मतलब है कि दान की रकम का बैंकिंग रिकॉर्ड भी बनाया जाता है।


SGPC का बजट

SGPC, यानी शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति, सिख धर्म का एक प्रमुख धार्मिक प्रबंधन निकाय है। यह हर साल बजट पेश करती है। मार्च 2025 में SGPC ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 1,386.47 करोड़ रुपये का बजट पारित किया था। इस बजट में आय के विभिन्न स्रोतों और विभिन्न विभागों तथा संस्थानों के खर्च का विवरण प्रस्तुत किया गया था। इसी रकम से धार्मिक गतिविधियों के अलावा शिक्षा, जनकल्याण, धार्मिक प्रचार, संस्थानों के संचालन और अन्य सामाजिक कार्यों पर खर्च किया जाता है।


ऑडिट की प्रक्रिया

गुरुद्वारा प्रबंधन में वित्तीय पारदर्शिता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ऑडिट है। SGPC के खातों का नियमित ऑडिट किया जाता है। हरियाणा के गुरुद्वारा प्रबंधन कानून में भी समिति, गुरुद्वारों और उनसे जुड़ी संपत्तियों के खातों के ऑडिट का स्पष्ट प्रावधान है। कानून के अनुसार, समिति के खातों का ऑडिट योग्य ऑडिटर से कराया जाना चाहिए। इससे यह स्पष्ट होता है कि गुरुद्वारों की बड़ी प्रबंधन संस्थाओं में दान और खर्च के रिकॉर्ड को औपचारिक लेखा व्यवस्था से जोड़ा जाता है।


क्या गुरुद्वारों में भी चंदे की चोरी नहीं होती?

सिख गुरुद्वारों में अब तक दान चोरी की कोई शिकायत नहीं आई है। इसके पीछे गुरुद्वारों की लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं बताई जा रही हैं। हर दान पेटी में दो ताले होते हैं और इसे अमृतसर के गोल्डन टेम्पल में स्थित SGPC हेडक्वार्टर से भेजे गए एक विशेष नंबर वाली सील से बंद किया जाता है। यह सील आधिकारिक तौर पर नियुक्त गुरुद्वारा इंस्पेक्टर द्वारा भेजी जाती है। जब गोलक खोली जाती है, तो इंस्पेक्टर पहले सील की जांच करते हैं। इसके अलावा, गुरुद्वारों में संगत को हर महीने पैसों के लेनदेन की जानकारी दी जाती है।