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ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: भारत की महत्वाकांक्षी योजना पर उठे सवाल

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट, जो भारत की प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं में से एक है, के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। इस परियोजना का उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति को मजबूत करना है, लेकिन पर्यावरणीय चिंताओं के कारण विवाद भी उत्पन्न हो गया है। जानें इस महत्वाकांक्षी योजना के विभिन्न पहलुओं और इसके संभावित प्रभावों के बारे में।
 

नई दिल्ली में ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का विरोध

नई दिल्ली: भारत की प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं में से एक ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। इस परियोजना की लागत 72 हजार करोड़ से लेकर 92 हजार करोड़ रुपये के बीच है और इसे ग्रेट निकोबार द्वीप पर विकसित किया जा रहा है, जो अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का सबसे दक्षिणी हिस्सा है। इस योजना में एक विशाल अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, एक टाउनशिप और एक पावर प्लांट शामिल हैं।


प्रोजेक्ट के विभिन्न चरण

अलग-अलग चरणों में पूरा होगा प्रोजेक्ट

इस परियोजना को विभिन्न चरणों में लागू करने की योजना बनाई गई है। विकास का पहला चरण 2025 से 2035 के बीच पूरा होगा। इसका एक प्रमुख आकर्षण गैलाथिया खाड़ी में प्रस्तावित पोर्ट है, जो प्रारंभ में 4.4 मिलियन TEU (कंटेनर) को संभालने की क्षमता रखेगा और बाद में इसे 16 मिलियन TEU तक बढ़ाया जाएगा। यह पोर्ट इतना गहरा होगा कि बड़े कार्गो जहाज आसानी से यहां आ सकें। इसके अलावा, एक 'डुअल-यूज' अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा भी बनाया जाएगा, जो नागरिक और रक्षा दोनों प्रकार के ऑपरेशन्स में सहायक होगा। ऊर्जा की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए गैस और सौर ऊर्जा पर आधारित 450 MVA का पावर प्लांट भी स्थापित किया जाएगा, साथ ही एक आधुनिक टाउनशिप भी विकसित की जाएगी जिसमें रहने और व्यापार करने की सभी सुविधाएं उपलब्ध होंगी।


प्रोजेक्ट का उद्देश्य

प्रोजेक्ट का मकसद क्या है?

इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक और आर्थिक स्थिति को मजबूत करना है। यह प्रोजेक्ट मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित है, जो विश्व का एक प्रमुख शिपिंग मार्ग है और जहां से लगभग 30% वैश्विक व्यापार होता है। इस परियोजना के माध्यम से भारत की सिंगापुर और कोलंबो जैसे विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे व्यापार को बढ़ावा मिलेगा और राजस्व में भी वृद्धि होगी। इसके अलावा, इस परियोजना से 40,000 से 50,000 नई नौकरियों का सृजन होने की उम्मीद है, साथ ही पर्यटन और लॉजिस्टिक्स क्षमताओं में भी सुधार होगा।


विरोध के कारण

प्रोजेक्ट को लेकर क्यों हो रहा है विरोध?

हालांकि, इस परियोजना को लेकर विवाद भी उत्पन्न हो गया है। राजनेता और पर्यावरण समूह इस परियोजना के खिलाफ तर्क कर रहे हैं कि इससे बड़े पैमाने पर वनों की कटाई हो सकती है, जिससे लगभग 160 वर्ग किलोमीटर वन भूमि प्रभावित होगी और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को भी नुकसान पहुंचेगा। इसके अलावा, शोम्पेन और निकोबारी जैसी स्वदेशी जनजातियों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर भी चिंताएं व्यक्त की गई हैं।


सरकार का जवाब

सरकार ने दावों को किया खारिज

सरकार ने इन चिंताओं को खारिज करते हुए कहा है कि कुल वन क्षेत्र का केवल 1.82% हिस्सा ही इस परियोजना से प्रभावित होगा। लगभग 18 लाख 65 हजार पेड़ों में से, लगभग 7 लाख 11 हजार पेड़ों को विभिन्न चरणों में काटा जा सकता है। अधिकारी यह भी बताते हैं कि पर्यावरण से संबंधित मंजूरियां वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया जैसी संस्थाओं द्वारा की गई विस्तृत अध्ययन के बाद ही दी गई हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने भी इस परियोजना को मंजूरी दी है।


पर्यावरण सुरक्षा के उपाय

पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं को दूर करने के लिए कोरल को दूसरी जगह स्थानांतरित करना, वन्यजीव प्रबंधन योजनाएं और निरंतर निगरानी रखने वाले सिस्टम जैसे उपाय सुझाए गए हैं। हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में मुआवजे के तौर पर पेड़ लगाए जाएंगे। आदिवासी समुदायों के संबंध में सरकार ने आश्वासन दिया है कि किसी का भी विस्थापन नहीं होगा। मौजूदा नीतियों का सख्ती से पालन किया जाएगा और आदिवासी आरक्षित क्षेत्रों के विस्तार की उम्मीद है।


महत्वपूर्ण ड्रीम प्रोजेक्ट

क्यों जरूरी है ये ड्रीम प्रोजेक्ट?

कुल मिलाकर, ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत की रणनीतिक उपस्थिति और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, यह पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में स्थित है, इसलिए इसे बारीकी से परखा जा रहा है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि विकास की आवश्यकताओं और पर्यावरण की सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाता है और परियोजना के पूरे होने तक पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित की जाती है।