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चंडीगढ़ के आसपास 16 गांवों में निर्माण पर रोक: हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण आदेश

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने चंडीगढ़ के निकट 16 गांवों में सभी प्रकार के निर्माण कार्यों और भूमि हस्तांतरण पर रोक लगाने का आदेश दिया है। यह निर्णय शिवालिक पहाड़ियों के पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में लिया गया है। अदालत ने कहा कि वर्षों से वन भूमि की पहचान और सीमांकन की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है, जबकि इस दौरान क्षेत्र में निर्माण कार्य बढ़ते गए हैं। उच्च न्यायालय ने पंजाब सरकार को निर्देश दिया है कि वह एक विशेष टीम गठित करे जो वन भूमि की पहचान करे। जानें इस महत्वपूर्ण आदेश के पीछे की पूरी कहानी और इसके पर्यावरणीय प्रभाव।
 

चंडीगढ़ के आसपास निर्माण पर रोक


चंडीगढ़ के आसपास निर्माण पर रोक: पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने चंडीगढ़ के निकट 16 गांवों में सभी प्रकार के निर्माण कार्यों और भूमि हस्तांतरण पर रोक लगाने का आदेश दिया है। यह निर्णय शिवालिक पहाड़ियों के पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में लिया गया है। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के 2014 के निर्देश से संबंधित है, जिसमें पंजाब सरकार को वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत वन भूमि की पहचान करने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने कहा कि वर्षों के बीतने के बावजूद वन भूमि की पहचान और सीमांकन की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है, जबकि इस दौरान क्षेत्र में निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियों में वृद्धि हुई है। अदालत ने इसे पर्यावरण के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया।


निर्माण और भूमि हस्तांतरण पर रोक

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय की पीठ ने आदेश दिया है कि संबंधित 16 गांवों में किसी भी प्रकार के नए निर्माण, विकास कार्य या भूमि के हस्तांतरण की अनुमति नहीं दी जाएगी। अदालत ने निर्देश दिया कि अगले 6 सप्ताह तक या जब तक वन भूमि की पहचान की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक भूमि के रिकॉर्ड में किसी भी प्रकार की म्यूटेशन एंट्री नहीं की जाएगी। इसके साथ ही भूमि की खरीद-बिक्री या किसी अन्य प्रकार के हस्तांतरण पर भी रोक लगा दी गई है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि आदेशों का उल्लंघन किया गया, तो इसे अदालत की अवमानना माना जाएगा और संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जा सकती है।


आदेश का दायरा

उच्च न्यायालय के आदेश में शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी में स्थित कई गांव शामिल हैं, जैसे करोरां, नाडा, पारच, सुंक, मजरियन, छोटी नागल, बड़ी नागल, पारोल, सिसवां, पल्लनपुर, सैनी माजरा, डुलवां, बुराना, गोचर, मिर्जापुर, तारापुर और सुल्तानपुर। अदालत ने कहा कि प्रारंभिक राजस्व रिकॉर्ड की जांच से संकेत मिलता है कि इन क्षेत्रों की कई भूमि वन भूमि की श्रेणी में आती हैं। इसलिए इनकी वास्तविक स्थिति और कानूनी दर्जे को स्पष्ट करना आवश्यक है। एक बार जब सरकार यह कार्य पूरा कर लेगी, तो स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।


पंजाब सरकार को निर्देश

उच्च न्यायालय ने पंजाब के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि वह एक विशेष टीम गठित करें, जो यह पता लगाए कि वन संरक्षण अधिनियम 1980 लागू होने के समय कौन-कौन सी भूमि वन भूमि के रूप में मौजूद थी। अदालत ने संबंधित गांवों के सभी राजस्व रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने का आदेश दिया है। इन रिकॉर्ड को दो वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी में रखा जाएगा और इसकी प्रतियां एक सप्ताह के भीतर उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल के पास जमा करनी होंगी। इसके अलावा मोहाली के डिप्टी कमिश्नर को अगली सुनवाई में सभी संबंधित दस्तावेजों के साथ व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है।


पर्यावरणीय चिंताएं

कई जनहित याचिकाओं और एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि यह मामला चंडीगढ़ के आसपास गंभीर पर्यावरणीय और पारिस्थितिक चिंताओं से जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि कुछ रेस्तरां और अवैध गतिविधियों पर कार्रवाई की गई, लेकिन इसके बावजूद क्षेत्र में कई अन्य व्यावसायिक गतिविधियां और बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य जारी रहे। याचिकाकर्ताओं ने अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए और आरोप लगाया कि प्रशासन की लापरवाही के कारण संवेदनशील क्षेत्र में निर्माण बढ़ता गया।


मामले की शुरुआत

इस मामले की शुरुआत वर्ष 2004 में प्रकाशित एक समाचार रिपोर्ट से हुई थी। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि तत्कालीन रोपड़ जिले (अब मोहाली) के करोरां गांव में वन भूमि पर एक क्लब का निर्माण किया गया था। इसके बाद उच्च न्यायालय ने इस मामले पर स्वतः संज्ञान लिया और भूमि की प्रकृति की जांच की। अदालत ने पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम, 1900 (PLPA) के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए पाया था कि करोरां गांव की करीब 3700 एकड़ भूमि राजस्व रिकॉर्ड में वन भूमि के रूप में दर्ज थी। उच्च न्यायालय ने उस समय इस क्षेत्र को संरक्षित रखने के निर्देश दिए थे।


2014 के फैसले का संदर्भ

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने बीएस संधू बनाम भारत सरकार मामले में उच्च न्यायालय के पुराने फैसले को बदल दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि केवल किसी भूमि का पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम, 1900 के तहत आना ही उसे स्वतः वन भूमि घोषित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि पहले यह निर्धारित करना आवश्यक है कि वन संरक्षण अधिनियम, 1980 लागू होने के समय संबंधित भूमि की वास्तविक प्रकृति क्या थी। इसी आधार पर पंजाब सरकार को वन भूमि की पहचान और सीमांकन की प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन उच्च न्यायालय ने अब चिंता जताई है कि यह प्रक्रिया अभी तक पूरी नहीं हो सकी है। उच्च न्यायालय का यह आदेश यह सुनिश्चित करने के लिए है कि जब तक भूमि की वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं हो जाती, तब तक क्षेत्र में कोई ऐसा बदलाव न हो जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचे।