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चुनाव आयोग की गड़बड़ियों पर उठे सवाल, पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में समस्याएं

हाल ही में चुनाव आयोग द्वारा की गई गड़बड़ियों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं, खासकर पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में समस्याओं के संदर्भ में। आयोग की तकनीकी गड़बड़ियों और मानवीय भूलों के दावों पर संदेह जताया जा रहा है। क्या यह सब संयोग है या कुछ और? इस लेख में हम इन मुद्दों पर चर्चा करेंगे और जानेंगे कि कैसे ये समस्याएं चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं।
 

चुनाव आयोग की तकनीकी गड़बड़ियों पर चिंता

चुनाव आयोग द्वारा हाल ही में कई गड़बड़ियों की सूचना मिली है। कहीं भाजपा के नाम से चिट्ठियां जारी हो रही हैं, तो कहीं मतदाता सूची से सांसदों के नाम गायब हो रहे हैं। आयोग का कहना है कि ये तकनीकी समस्याएं हैं, जिन्हें ठीक कर लिया गया है या फिर ये मानवीय भूलें हैं, जिन पर कार्रवाई की गई है। लेकिन क्या इतनी गड़बड़ियां अचानक होना एक संयोग है या कुछ और? पहले कभी इतनी समस्याएं नहीं आईं। यह भी सवाल उठता है कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण में इतनी समस्याएं क्यों आईं? सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर सवाल उठाया है। देश के 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर का कार्य हुआ है, जबकि अन्य राज्यों में सब कुछ सामान्य रहा है। उत्तर प्रदेश में भी समय सीमा बढ़ानी पड़ी, लेकिन वहां की समस्याएं पश्चिम बंगाल जैसी नहीं थीं।


पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची की स्थिति

पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग यह स्पष्ट नहीं कर रहा है कि विचाराधीन श्रेणी के 60 लाख से अधिक मतदाताओं के दस्तावेजों की समीक्षा के बाद कितने नाम हटाए गए। आयोग ने केवल यह बताया कि 29 लाख मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच की गई, लेकिन कितने नाम कटे, इसका आंकड़ा नहीं दिया। सूची जारी करने में भी आयोग ने कई दिन लगाए और आधी रात को चुपचाप सूची जारी की। इसके बाद तकनीकी गड़बड़ियों का सामना करना पड़ा, जिसमें मतदाताओं के नाम या तो विचाराधीन श्रेणी में दिखने लगे या पूरी तरह से गायब हो गए। ममता बनर्जी की पार्टी के नेताओं के साथ भी ऐसा हुआ। चुनाव आयोग ने इसे तकनीकी गड़बड़ी बताया और इसे सुधारने का आश्वासन दिया। यदि मतदान केंद्र पर मतदाताओं को पता चले कि उनका नाम कट गया है, तो यह एक गंभीर समस्या होगी।


केरल में चुनाव आयोग की गड़बड़ी

केरल में भी चुनाव आयोग ने एक गंभीर गड़बड़ी की है। उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी देने के संदर्भ में एक पुराने आदेश के तहत पार्टियों को चिट्ठी भेजी गई, जिसमें भाजपा की मुहर लगी थी। विवाद बढ़ने पर आयोग ने कहा कि यह क्लर्क की गलती थी। सवाल यह है कि चुनाव आयोग के कार्यालय में भाजपा की मुहर कैसे थी और क्यों एक क्लर्क ने उस पर मुहर लगाई? आयोग ने कहा कि उसने संबंधित क्लर्क के खिलाफ कार्रवाई की है, लेकिन बाद में आयोग ने सोशल मीडिया से उस चिट्ठी की कॉपी हटाने का प्रयास किया। चूंकि कई पार्टियों ने इसे साझा किया था, अब आयोग उन पर दबाव बना रहा है कि वे इसे हटाएं। इस मामले ने चुनाव आयोग की साख को और भी कमजोर कर दिया है।