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चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में फॉर्म 6 पर उठे सवालों का दिया जवाब

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में फॉर्म 6 के संदर्भ में उठे सवालों का जवाब दिया है। आयोग ने आरोपों को खारिज करते हुए बताया कि निर्णय प्रक्रिया में सभी सदस्यों की सर्वसम्मति शामिल थी। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि फॉर्म 6 में संशोधन का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। इसके अलावा, आयोग ने आवेदन फॉर्म और घोषणा पत्र को अलग-अलग दस्तावेजों के रूप में रखने की जानकारी दी। जानें पूरी जानकारी इस लेख में।
 

चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण


चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में फॉर्म 6 के संदर्भ में उठे सवालों का उत्तर दिया है। आयोग ने उन आरोपों को खारिज किया है, जिसमें कहा गया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अन्य चुनाव आयुक्तों की अनुमति के बिना निर्णय लिए। आयोग का कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से संबंधित सभी आदेशों को सर्वसम्मति से मंजूरी दी गई थी।


निर्णय प्रक्रिया का विवरण

आयोग ने 26 अक्टूबर को दाखिल हलफनामे में बताया कि याचिका एक मीडिया रिपोर्ट पर आधारित है। यह जवाब मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों द्वारा संयुक्त रूप से प्रस्तुत किया गया है। आयोग ने स्पष्ट किया कि किसी अधिकारी या आयुक्त की राय को आयोग का आधिकारिक निर्णय नहीं माना जा सकता। निर्णय कानून के अनुसार ही लिया जाता है।


निर्णय लेने की प्रक्रिया

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि निर्णय प्रक्रिया में फाइल पहले एक चुनाव आयुक्त, फिर दूसरे और अंत में मुख्य चुनाव आयुक्त के पास जाती है। मंजूरी मिलने के बाद इसे आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज किया जाता है और संबंधित सदस्यों के हस्ताक्षर लिए जाते हैं। इसके बाद आयोग का सचिवालय अधिसूचना जारी करता है।


फॉर्म 6 में संशोधन के आरोप

फॉर्म 6 का उपयोग मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए किया जाता है। आयोग ने इसे SIR से संबंधित आदेशों के माध्यम से बदलने के आरोप को खारिज किया है। आयोग का कहना है कि फॉर्म 6 में संशोधन का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। हालांकि, आयोग ने स्वीकार किया कि ऑनलाइन पोर्टल पर फॉर्म 6 और घोषणा पत्र को इस तरह प्रस्तुत किया गया था कि लोगों को भ्रम हो सकता था।


आवेदन फॉर्म और घोषणा पत्र का अलगाव

आयोग ने बताया कि 21 अक्टूबर से आवेदन फॉर्म और घोषणा पत्र को अलग-अलग दस्तावेजों के रूप में रखा गया है। यह भी स्पष्ट किया गया कि जिन मतदाताओं का रिकॉर्ड उपलब्ध विवरणों से मेल नहीं खाता, उन्हें हर स्थिति में सुनवाई के लिए बुलाना अनिवार्य नहीं है। ऐसे मतदाताओं से आवश्यक दस्तावेज जुटाने के लिए बूथ लेवल अधिकारी (BLO) उनके घर जा सकते हैं।


मतदाता सूची से नाम हटाने पर स्पष्टीकरण

आयोग ने कहा कि मतदाता पंजीकरण अधिकारी (ERO) के आदेश के बिना किसी मतदाता का नाम ECINet पर न तो जोड़ा जाता है और न ही हटाया जाता है। गोवा में 97 कथित रूप से छूटे मतदाताओं के मामले में आयोग ने बताया कि 88 के नाम पहले से सूची में थे, छह विदेश में थे और तीन के पास पुर्तगाली पासपोर्ट थे। आयोग ने दशहरा अवकाश के कारण संक्षिप्त जवाब दिया है और विस्तृत जवाब दाखिल करने की अनुमति मांगी है।