चुनाव आयोग में मतभेद: क्या है SIR विवाद की सच्चाई?
चुनाव आयोग में असहमति की हलचल
नई दिल्ली: देश के चुनावी तंत्र की प्रमुख संस्था चुनाव आयोग में मतभेदों की खबरों ने राजनीतिक जगत में हलचल मचा दी है। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर आयोग के तीन सदस्यों के बीच असहमति की रिपोर्ट सामने आने के बाद सवाल उठने लगे हैं, जिसके चलते चुनाव आयोग को इस पर स्पष्टीकरण देना पड़ा है।
चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण
चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, किसी भी मुद्दे पर चर्चा के दौरान चुनाव आयुक्तों का सवाल पूछना या अपनी राय व्यक्त करना सामान्य प्रक्रिया है, और इसे औपचारिक असहमति नहीं माना जाना चाहिए। सूत्रों का कहना है कि SIR से संबंधित कई मुद्दों पर दोनों आयुक्तों ने टिप्पणियां कीं, लेकिन किसी ने भी अंतिम निर्णय के खिलाफ औपचारिक रूप से विरोध नहीं जताया। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि जिन आदेशों को विवाद का कारण बताया जा रहा है, उन पर तीनों सदस्यों के हस्ताक्षर हैं।
पिछले मतभेदों का इतिहास
क्या पहले भी दर्ज हुआ है ऐसा मतभेद
यह पहली बार नहीं है जब चुनाव आयोग के किसी सदस्य ने बहुमत से अलग राय रखी हो। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान, तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनावी भाषणों से संबंधित आचार संहिता पर अपने साथी सदस्यों से भिन्न राय व्यक्त की थी। इससे पहले, 2009 में मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने सोनिया गांधी की अयोग्यता के मामले में अलग रुख अपनाया था।
चुनाव आयोग का विकास
जब सिर्फ एक ही सदस्य संभालता था आयोग
चुनाव आयोग की स्थापना 1950 में एकल सदस्यीय निकाय के रूप में हुई थी, जो 1989 तक जारी रहा। 1989 में दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की गई, लेकिन यह व्यवस्था लंबे समय तक नहीं चली। 1993 में तीन सदस्यीय आयोग का स्थायी ढांचा स्थापित किया गया।
विपक्ष की प्रतिक्रिया
विपक्ष ने उठाए तीखे सवाल
इस मुद्दे पर विपक्ष ने आक्रामक रुख अपनाया है। टीएमसी सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने कहा कि यदि दो चुनाव आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त के फैसलों पर आपत्ति जताई है, तो राज्यसभा में लंबित प्रस्ताव को आगे बढ़ाया जाना चाहिए। इसके अलावा, सपा प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने भी आयोग के कार्यों पर सवाल उठाए हैं।