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छात्र आंदोलनों का इतिहास: सरकारों को चुनौती देने वाले प्रदर्शन

छात्र आंदोलनों का इतिहास भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। ये आंदोलन न केवल सरकारों को चुनौती देते हैं, बल्कि कई बार उन्हें गिराने में भी सफल होते हैं। हाल ही में, कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा आयोजित 'चलो संसद' मार्च ने एक बार फिर से छात्रों की आवाज को उठाया है। जानें कैसे 1973 का अहमदाबाद आंदोलन, जेपी आंदोलन और असम आंदोलन ने भारतीय राजनीति को प्रभावित किया और छात्रों ने अपनी मांगों को मनवाने के लिए संघर्ष किया।
 

छात्रों की आवाज़ संसद से सड़क तक

छात्रों की आवाज़ अब संसद से लेकर सड़कों तक गूंज रही है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने नीट परीक्षा लीक और अन्य मुद्दों पर 20 जुलाई को 'चलो संसद' मार्च का आयोजन किया। इस मार्च में बड़ी संख्या में युवा शामिल हुए, जिसके चलते दिल्ली पुलिस ने बल प्रयोग कर प्रदर्शनकारी छात्रों को खदेड़ दिया। छात्रों पर लाठीचार्ज के बाद सरकार की स्थिति और भी कठिन हो गई। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल, जो पहले अपने तरीके से इस मुद्दे पर प्रदर्शन कर रहे थे, अब सड़कों पर उतर आए हैं। राहुल गांधी समेत कई कांग्रेस नेता पीएम मोदी के आवास के बाहर प्रदर्शन करने पहुंचे और कई नेता जंतर-मंतर पर CJP के प्रदर्शन में शामिल हुए। यह पहला आंदोलन नहीं है जिसने सरकार की मुश्किलें बढ़ाई हैं।


छात्र आंदोलनों का ऐतिहासिक महत्व

भारत के इतिहास में, आजादी से पहले और बाद में कई छात्र आंदोलनों ने सरकारों को चुनौती दी है। इन प्रदर्शनों ने कई नेताओं को जन्म दिया और कई नेताओं की कुर्सियां भी छीन लीं। अब छात्रों की नजर मौजूदा शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की कुर्सी पर है।


1973 का अहमदाबाद आंदोलन

दिसंबर 1973 में, अहमदाबाद के एल.डी. कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के छात्रों ने हॉस्टल के मेस बिल में वृद्धि के खिलाफ हड़ताल शुरू की। यह आंदोलन जल्द ही भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ जन आंदोलन में बदल गया। छात्रों ने 'नवनिर्माण युवक समिति' का गठन किया और राज्यभर में रैलियां, भूख हड़ताल और जनता कर्फ्यू जैसे अनोखे विरोध प्रदर्शन किए। इस जन आक्रोश के कारण, फरवरी 1974 में तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को इस्तीफा देना पड़ा और गुजरात में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहला मौका था जब जन दबाव में किसी निर्वाचित सरकार को गिराया गया।


जेपी आंदोलन

1970 के दशक में बढ़ती बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और खाद्यान्न संकट ने आम जनता को परेशान किया। इसी समय गुजरात में नवनिर्माण आंदोलन हुआ, जिसने बिहार में भी आंदोलन को प्रेरित किया। छात्रों ने महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किया। समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया और इसे संपूर्ण क्रांति का रूप दिया। यह आंदोलन इतना प्रभावशाली था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार पर भारी दबाव बना। इसके परिणामस्वरूप देश में आपातकाल लागू हुआ और 1977 के आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी सत्ता से बाहर हो गई।


असम में छात्रों का आंदोलन

असम में कई छात्र आंदोलनों का इतिहास रहा है, लेकिन 1979 से 1985 के बीच का असम आंदोलन सबसे प्रभावशाली था। इसे 'विदेशी विरोधी आंदोलन' भी कहा जाता है। 1979 में मंगलदोई लोकसभा उपचुनाव के दौरान मतदाता सूची में संदिग्ध प्रवासियों के नाम पाए गए, जिससे असमिया समुदाय में अपनी पहचान खोने का डर पैदा हुआ। ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) ने विदेशी नागरिकों की पहचान और निष्कासन की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया। इस 6 साल लंबे संघर्ष में लगभग 855 लोगों ने अपनी जान गंवाई। 15 अगस्त 1985 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की उपस्थिति में केंद्र सरकार और छात्र नेताओं के बीच ऐतिहासिक असम समझौता हुआ, जिसके तहत 25 मार्च 1971 के बाद असम में आने वाले अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें निर्वासित करने का निर्णय लिया गया।