जस्टिस यशवंत वर्मा का इस्तीफा: भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच विवादित प्रक्रिया
जस्टिस वर्मा का इस्तीफा
जस्टिस यशवंत वर्मा ने भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते चल रही महाभियोग प्रक्रिया के बीच इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज के पद से इस्तीफा दे दिया है। पिछले वर्ष दिल्ली में उनके निवास से बड़ी मात्रा में नकदी मिलने के बाद से वर्मा विवादों में थे। उन्होंने उस समय यह स्पष्ट किया था कि वह नकदी उनकी नहीं है।
इस्तीफे का कारण
अपने इस्तीफे में, जो उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेजा, जस्टिस वर्मा ने अचानक लिए गए इस निर्णय का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया। हालांकि, जजेस इन्क्वॉयरी कमेटी को भेजे गए पत्र में उन्होंने अपनी निर्दोषता के कई तर्क प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने 13 पन्नों का एक विस्तृत पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने 2025 में अपने सरकारी आवास में आग लगने की घटना और उसके बाद मिली नकदी को पूरी तरह से खारिज किया। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया अनुचित और पक्षपाती थी।
छुट्टी पर होने का दावा
जस्टिस वर्मा, जो 2021 से दिल्ली हाई कोर्ट के जज थे, ने उल्लेख किया कि वे हाई कोर्ट की होली ब्रेक पर छुट्टी पर थे जब 12-13 मार्च 2025 को स्टोररूम में आग लगी। उन्होंने कहा कि आग बुझाने वाले कर्मियों ने कुछ वीडियो रिकॉर्ड किए, जिनमें नकदी दिखाई दी। मीडिया में इसे 'जज के घर का काला धन' बताकर हंगामा मच गया। लेकिन वर्मा का कहना है कि स्टोररूम उनके परिवार के हिस्से से अलग था और वह घटना के समय छुट्टी पर थे।
गवाहों को ड्रॉप करने का आरोप
जस्टिस वर्मा ने पत्र में न्यायिक जांच की प्रक्रिया पर जोर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि इन-हाउस कमेटी की रिपोर्ट प्रारंभिक और गोपनीय थी, फिर भी इसे सबूत के रूप में इस्तेमाल किया गया। 54 गवाहों में से 27 को बिना कारण छोड़ा गया, जिनमें कई ऐसे थे जिनकी गवाही उनके पक्ष में जाती। उन्होंने कहा कि क्रॉस-एक्जामिनेशन के बाद फेवरेबल गवाहों को अचानक हटा दिया गया।
जस्टिस वर्मा के पत्र की मुख्य बातें
- स्टोररूम उनके नियंत्रण में नहीं था: जस्टिस वर्मा ने स्पष्ट किया कि स्टोररूम आवास के रहने वाले हिस्से से अलग था।
- घटना के समय वे छुट्टी पर थे: 12 मार्च 2025 को वे पत्नी के साथ हिल स्टेशन पर थे।
- कैश के बारे में उन्हें जानकारी नहीं थी: उन्होंने इसे 'अनुमान' पर आधारित आरोप बताया।
- 54 गवाहों में से 27 को बिना वजह ड्रॉप किया गया: कई गवाह जिनकी गवाही उनके पक्ष में थी, उन्हें अचानक हटा दिया गया।
- क्रॉस-एक्जामिनेशन के बाद फेवरेबल गवाहों को हटाया गया: गवाहों को कमजोर पाए जाने के बाद ड्रॉप कर दिया गया।
- बर्डन ऑफ प्रूफ: उन्हें 'कैश कहां से आया' साबित करने को कहा गया।
- CCTV, DVR और फॉरेंसिक रिपोर्ट गायब: कोई CCTV फुटेज पेश नहीं की गई।
- तीनों चार्जेस बिना सबूत के: चार्ज सभी को 'अनुमानों' पर आधारित बताया।
- इन-हाउस कमेटी की रिपोर्ट का दुरुपयोग: प्रारंभिक रिपोर्ट को सबूत मान लिया गया।
- अन्याय की प्रक्रिया को वैधता नहीं देना चाहते: उन्होंने लिखा कि ऐसी प्रक्रिया जारी रखना न्यायपालिका के लिए घातक होगा।