×

जातिवाद के खिलाफ मोहन भागवत का संदेश: सोच में बदलाव लाने की जरूरत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने जातिवाद के खिलाफ एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा कि जातिवाद को समाप्त करने के लिए लोगों की सोच में बदलाव लाना आवश्यक है। भागवत ने आरएसएस के शताब्दी वर्ष पर आयोजित जन संगोष्ठी में जाति व्यवस्था की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर चर्चा की और बताया कि मानसिक बदलाव से ही जातिवाद को समाप्त किया जा सकता है। उन्होंने संघ के उद्देश्य को भी स्पष्ट किया, जिसमें समाज को सशक्त और संगठित बनाना शामिल है। जानें उनके विचार और संघ की दृष्टि के बारे में।
 

जातिगत भेदभाव पर मोहन भागवत का स्पष्ट बयान


नई दिल्ली : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने जातिगत भेदभाव के मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा कि जातिवाद को समाप्त करने के लिए कानून या दबाव का सहारा नहीं लेना चाहिए, बल्कि लोगों की मानसिकता में बदलाव लाना आवश्यक है। यदि समाज से इस बुराई को मिटाना है, तो सबसे पहले जाति की भावना को व्यक्ति के मन से निकालना होगा।


आरएसएस के शताब्दी वर्ष पर जन संगोष्ठी

शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित जन संगोष्ठी
यह विचार मोहन भागवत ने आरएसएस के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित जन संगोष्ठी में व्यक्त किए। इस कार्यक्रम में उन्होंने आम जनता से संवाद किया और समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की। उनके साथ प्रांत संघचालक अनिल भालेराव भी उपस्थित थे। भागवत ने संघ की विचारधारा, सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण के सिद्धांतों पर विस्तार से प्रकाश डाला।


जाति का ऐतिहासिक संदर्भ

पेशे से जुड़ी थी जाति, भेदभाव से नहीं
जाति व्यवस्था के ऐतिहासिक संदर्भ पर बात करते हुए भागवत ने कहा कि प्राचीन काल में जाति का संबंध व्यक्ति के कार्य और पेशे से था। इसका उद्देश्य समाज के कार्यों को व्यवस्थित करना था, न कि किसी को ऊंचा या नीचा दिखाना। लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था कठोर हो गई और भेदभाव का कारण बन गई, जिससे सामाजिक एकता को नुकसान पहुंचा।


जातिवाद का समाधान मानसिक बदलाव में

मन से जाति मिटेगी तो समाज बदलेगा
भागवत ने कहा कि जातिवाद को समाप्त करने का सबसे प्रभावी तरीका मानसिक बदलाव है। उन्होंने कहा कि यदि लोग ईमानदारी से अपने मन से जाति की भावना को निकाल दें, तो 10 से 12 वर्षों में समाज से जातिवाद समाप्त किया जा सकता है। उनके अनुसार, जब तक भेदभाव की सोच बनी रहेगी, तब तक बाहरी उपाय स्थायी समाधान नहीं दे सकते।


आरएसएस का उद्देश्य

संघ का उद्देश्य: समाज को साथ लेकर आगे बढ़ना
संगोष्ठी में पूछे गए सवालों के जवाब में भागवत ने आरएसएस के उद्देश्य को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि संघ का लक्ष्य भारत को उसके सर्वोत्तम गौरव तक पहुंचाना है, लेकिन यह कार्य समाज को साथ लेकर किया जाना चाहिए। संघ किसी प्रतिक्रिया के रूप में बना संगठन नहीं है और न ही वह किसी से प्रतिस्पर्धा करता है। उसका मूल कार्य व्यक्ति के चरित्र निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण करना है।


संघ का दृष्टिकोण

संघ खुद नहीं, समाज को बड़ा बनाना चाहता है
मोहन भागवत ने यह भी कहा कि आरएसएस खुद को बड़ा करने की कोशिश नहीं करता। उसका उद्देश्य समाज को सशक्त, संगठित और आत्मनिर्भर बनाना है। उन्होंने लोगों से अपील की कि अगर वे संघ को सही मायनों में समझना चाहते हैं, तो उसकी विचारधारा को दूर से देखने के बजाय शाखाओं में आकर अनुभव करें। उनके अनुसार, संघ की असली पहचान उसके दैनिक कार्य और सामाजिक समरसता के प्रयासों में दिखाई देती है।