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जेएनयू में नया विवाद: छात्रों के प्रदर्शन और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

जेएनयू में हालिया विवाद ने एक बार फिर से राजनीतिक चर्चाओं को जन्म दिया है। छात्रों के प्रदर्शन और प्रशासन की प्रतिक्रिया के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न देने के फैसले के खिलाफ छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया। इस विवाद ने 2016 के घटनाक्रम की याद दिलाई है, जब कैंपस में राष्ट्र-विरोधी नारों को लेकर हंगामा हुआ था। जानें इस मुद्दे पर सभी पक्षों की राय और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं।
 

नई दिल्ली में जेएनयू का विवाद


नई दिल्ली: जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय एक बार फिर से राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र बन गया है। 2016 के विवाद के लगभग एक दशक बाद, कैंपस में हालिया नारेबाजी को लेकर नया विवाद उत्पन्न हुआ है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न देने के निर्णय के खिलाफ छात्रों के विरोध से संबंधित है। छात्रों के प्रदर्शनों, वीडियो क्लिपों और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं ने जेएनयू को फिर से राष्ट्रीय बहस में ला खड़ा किया है।


विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

5 जनवरी को, सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से मना कर दिया। इसके विरोध में जेएनयू में एक सभा का आयोजन किया गया, जो 2020 में कैंपस में हुई हिंसा की बरसी से भी जुड़ी थी। इस दौरान कुछ कथित नारों के वीडियो सामने आए, जिन्हें विश्वविद्यालय प्रशासन ने आचार संहिता का उल्लंघन मानते हुए FIR की मांग की।


प्रशासन और छात्रों के दृष्टिकोण

जेएनयू प्रशासन का कहना है कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के खिलाफ लगाए गए नारे भड़काऊ और आपत्तिजनक थे। सुरक्षा प्रमुख ने इन्हें लोकतांत्रिक विरोध की सीमाओं से बाहर बताया। दूसरी ओर, जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष अदिति मिश्रा ने कहा कि ये नारे वैचारिक थे और किसी व्यक्ति पर व्यक्तिगत हमला नहीं थे। छात्रों का तर्क है कि अदालत के निर्णयों से असहमति जताना भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक हिस्सा है।


राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

2016 की तरह, इस बार भी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तीव्र रही हैं। बीजेपी नेताओं ने प्रदर्शनकारियों को राष्ट्र-विरोधी और शहरी नक्सल जैसे शब्दों से घेरने की कोशिश की। गिरिराज सिंह ने 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' का उल्लेख किया। वहीं, कांग्रेस और आरजेडी नेताओं ने कहा कि विरोध का अधिकार मौलिक है, लेकिन भाषा को मर्यादित रखना चाहिए। मनोज झा ने दोहरे मापदंडों की बात की।


यह नया विवाद 2016 की घटनाओं की याद दिलाता है, जब अफजल गुरु से जुड़े कार्यक्रम के बाद कथित राष्ट्र-विरोधी नारों पर देशभर में हंगामा हुआ था। तब भी वीडियो क्लिप निर्णायक साबित हुए थे। बाद में फोरेंसिक जांच में कुछ वीडियो में छेड़छाड़ की बात सामने आई थी। दोनों ही मामलों में पुलिस हस्तक्षेप और आंतरिक जांच की मांग की गई थी।


पुराने चेहरे, नई भूमिकाएं

2016 के कई प्रमुख चेहरे आज अलग-अलग भूमिकाओं में हैं। उमर खालिद 2026 तक पांच साल से अधिक समय तक जेल में रह चुके हैं और उन्होंने जमानत खारिज होने के बाद कहा कि यही उनकी जिंदगी है। कन्हैया कुमार अब कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं। शेहला राशिद ने राजनीति में रुख बदला है। जेएनयू का विवाद भले ही पुराना हो, लेकिन इसके प्रभाव और सवाल आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।