झारखंड में छात्रों का प्रदर्शन: 'गांव छोड़ब नाहीं' का गूंजता संदेश
रांची में छात्रों का जनसैलाब
रांची: झारखंड की राजधानी में सोमवार को एक बार फिर से छात्रों का विशाल प्रदर्शन देखने को मिला। JPSC और JSSC भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ युवा जब विधानसभा की ओर बढ़े, तो माहौल एक बार फिर से परिचित सुरों से गूंज उठा। भारी पुलिस बल, बैरिकेड्स और तीखे नारों के बीच प्रदर्शनकारियों की आवाज़ थी, 'गांव छोड़ब नाहीं'। यह गीत केवल एक संगीत रचना नहीं, बल्कि झारखंड की हर उचित लड़ाई का सांस्कृतिक प्रतीक बन चुका है। इसमें आदिवासी, मूलवासी और मेहनतकश समाज का वह दर्द छिपा है, जिसे विकास की अंधी दौड़ ने हमेशा हाशिए पर धकेला है।
प्रतिरोध की आवाज और लोक चेतना
प्रतिरोध की आवाज और लोक चेतना की हुंकार
इस गीत की रचना प्रसिद्ध फिल्मकार मेघनाद ने की थी और इसे पद्मश्री से सम्मानित लोकगायक मधु मंसूरी ने अपनी आवाज दी। जब भी झारखंड के जल, जंगल और जमीन पर संकट आया, या जब भी युवाओं और शोषितों के अधिकारों पर हमला हुआ, इस गीत ने जन-आंदोलन को एक वैचारिक दिशा दी है। आज भले ही आंदोलन की वजह नौकरी की पारदर्शिता की मांग हो, लेकिन छात्रों का संकल्प वही है: अपनी माटी और अधिकारों के लिए आखिरी सांस तक लड़ने का।
दर्द और हक की अमर दास्तान
दर्द और हक की अमर दास्तान
'गांव छोड़ब नाहीं' के बोल में आदिवासी, मूलवासी और मेहनतकश समाज का वह दर्द छिपा है, जिसे विकास की अंधी दौड़ ने हमेशा हाशिए पर धकेला। खदानों, बांधों और कारखानों के नाम पर उजड़ते गांवों की कहानी बयान करता यह गीत हर पीड़ित को एक सूत्र में पिरोता है। यही कारण है कि दशकों बाद भी जब कोई छात्र, किसान या मजदूर अपनी पहचान की लड़ाई लड़ने सड़कों पर उतरता है, तो यह गीत उसका सबसे बड़ा सहारा बन जाता है। सड़कों पर गूंजता यह सुर हुकूमतों से सीधे तीखे सवाल पूछता है। आखिर विकास की परिभाषा क्या है और इसकी कीमत हमेशा आम जनमानस को ही क्यों चुकानी पड़ती है? युवाओं का यह तेवर साफ बता रहा है कि हक की यह आवाज दबाई नहीं जा सकती।
गीत का अर्थ
क्या है गाने का मतलब
गीत में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि आदिवासी और ग्रामीण अपनी मातृभूमि और जंगल को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे। बांधों, कारखानों, खदानों और अभयारण्यों के नाम पर हो रहे विकास ने नदियों को सुखाकर प्रदूषित कर दिया है और प्रकृति को तबाह कर दिया है। उद्योगपति, नेता और अधिकारी आम जनता की जमीन छीन रहे हैं, जबकि मूल निवासी कचरा पानी पीने को मजबूर हैं। अंत में, भगवान बिरसा मुंडा के संदेश के माध्यम से सभी आदिवासियों, दलितों और किसानों को एकजुट होकर इस शोषण के खिलाफ आवाज उठाने और संघर्ष करने का आह्वान किया गया है। यह गीत झारखंड की हर उचित लड़ाई का सांस्कृतिक घोषणापत्र बन चुका है।