ट्रंप के युद्ध अभियान में अमेरिका की कमजोरियों का खुलासा
अमेरिका की सैन्य स्थिति पर चिंता
वर्तमान में ट्रंप ने अमेरिका को एक ऐसे संघर्ष में उलझा रखा है, जिससे देश की कमजोरियां लगातार उजागर हो रही हैं। अमेरिकी विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका अब अपने अश्वमेध अभियान को आगे बढ़ाने में असमर्थ है, जिसका मुख्य कारण उसके अस्त्र भंडारों की कमी है।
हाल ही में, ट्रंप ने व्हाइट हाउस में अपने सहयोगियों के साथ बैठक के दौरान अपनी निराशा व्यक्त की। ईरान के खिलाफ संघर्ष में असफलता पर उन्होंने गुस्सा जाहिर किया। अमेरिकी मीडिया के अनुसार,
- ट्रंप ने अमेरिका के सैन्य विकल्पों की कमी और संघर्ष के अंतिम चरण तक पहुंचने में विफलता पर अपनी नाराजगी व्यक्त की।
- हालांकि राष्ट्रपति ने सार्वजनिक रूप से आत्मविश्वास दिखाया है, लेकिन उनके करीबी सलाहकार भी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट नहीं हैं।
ट्रंप और उनके सलाहकारों की स्थिति को समझा जा सकता है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित अंतरराष्ट्रीय संबंधों के सिद्धांतों को तोड़ते हुए, ट्रंप प्रशासन ने वेनेजुएला पर हमले के बाद ईरान को अपना अगला लक्ष्य बनाया। यदि वे सफल होते, तो उनका लक्ष्य चीन तक पहुंचना था। लेकिन ईरान ने उनकी योजनाओं को विफल कर दिया।
प्रसिद्ध युद्ध विशेषज्ञ रॉबर्ट ए. पेप के अनुसार, "35 वर्षों से अमेरिका इस सैन्य सिद्धांत पर निर्भर रहा है: अग्रिम अड्डे, वायु वर्चस्व, सटीक हमले, और त्वरित विजय। लेकिन ईरान युद्ध ने इन सभी स्तंभों को ध्वस्त कर दिया है।"
प्रश्न यह है कि क्या अमेरिका ईरान युद्ध में जीत पाएगा। असली सवाल यह है कि अमेरिका हर साल ऐसे युद्ध मॉडल पर एक ट्रिलियन डॉलर खर्च कर रहा है, जिसका अब अस्तित्व ही नहीं है।
ट्रंप ने 28 फरवरी को ईरान पर हमले का निर्णय लिया, जो उनके सहयोगियों के दबाव में आया। पूर्व राष्ट्रीय आतंकवाद-विरोधी केंद्र के निदेशक जो केंट ने कहा कि बिना स्पष्ट रणनीति के युद्ध शुरू नहीं किया जाना चाहिए।
अमेरिकी थिंक टैंक CSIS की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि हाल के हफ्तों में ईरान के साथ युद्ध के कारण अमेरिकी सेना का हथियार भंडार गंभीर रूप से घट गया है।
- अमेरिकी भंडार में 827 से कम पैट्रियट इंटरसेप्टर और 278 से कम थाड बैलिस्टिक मिसाइल इंटरसेप्टर बचे हैं।
- सीएनएन के अनुसार, ये आंकड़े युद्ध से पहले के भंडार में एक बड़ी गिरावट को दर्शाते हैं।
- CSIS के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि घटते भंडार के कारण अमेरिका को अधिक जोखिम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।
द वॉशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट में भी अमेरिकी सैन्य संसाधनों पर दबाव का खुलासा हुआ है। जनरल एलेक्सस ग्रिनकेविच ने पेंटागन को चेतावनी दी है कि उनके पास पर्याप्त नौसैनिक बल नहीं हैं।
अमेरिका की सैन्य स्थिति अब उस मोड़ पर पहुंच गई है, जहां उसकी कमजोरियां स्पष्ट हो रही हैं।
चीन ने ईरान को कितनी मदद दी, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह साफ है कि अमेरिका की रक्षा तैयारियां अब चीन पर निर्भर हैं।
- चीन ने गैलियम, जर्मेनियम, और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिए हैं।
- इन खनिजों का उपयोग आधुनिक सैन्य उपकरणों के निर्माण में होता है।
- चीन के निर्यात प्रतिबंधों के कारण अमेरिकी रक्षा कंपनियों को पुर्जों की कमी का सामना करना पड़ रहा है।
अमेरिका ने इस संकट से निपटने के लिए औद्योगिक नीति अभियान शुरू किया है, लेकिन ये प्रयास अभी प्रारंभिक चरण में हैं।
ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका के हाथ बंधे हुए हैं। पिछले पांच महीनों में ईरान ने पश्चिम एशिया के सामरिक समीकरण बदल दिए हैं।
ट्रंप प्रशासन पहले ही ईरान में अपने कठपुतले को स्थापित करने के लक्ष्य को छोड़ चुका है। अब ईरान होरमुज जलमार्ग पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए अडिग है।
अमेरिका के लिए यह स्वीकार करना कठिन होगा कि वह इस जलमार्ग को खुला नहीं रख सका।