×

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी: राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पित एक महान नेता

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, एक महान राष्ट्रऋषि, ने भारतीय राजनीति में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को स्थापित किया। उनकी जयंती पर, हम उनके जीवन और योगदान को याद करते हैं, जिसमें उन्होंने राष्ट्रसेवा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। जानें कैसे उन्होंने जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के लिए संघर्ष किया और देश की एकता को बनाए रखा। उनके विचार और सिद्धांत आज भी प्रासंगिक हैं, और हमें एक सशक्त भारत के निर्माण में प्रेरित करते हैं।
 

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का योगदान


डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी आधुनिक भारत के एक महान राष्ट्रऋषि थे, जिन्होंने राजनीति को केवल सत्ता या व्यक्तिगत लाभ का साधन नहीं माना। उनके लिए यह राष्ट्रसेवा और राष्ट्रनिर्माण का एक पवित्र कार्य था, जिसमें व्यक्ति को अपने आप को समर्पित करना होता है।


6 जुलाई को श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती मनाई जाती है।


भारतीय संस्कृति में राष्ट्र केवल एक भूभाग या राजनीतिक समझौता नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत चेतना और सांस्कृतिक पहचान है। ऋग्वेद में कहा गया है— वयं राष्ट्रे जाग्रयाम पुरोहिताः। इसका अर्थ है कि हमें राष्ट्र के प्रति जागरूक रहना चाहिए और अपनी जिम्मेदारियों को निभाना चाहिए।


बीसवीं सदी के मध्य में, जब भारत स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा था, डॉ. मुखर्जी ने इस वैदिक राष्ट्रचेतना को आधुनिक राजनीति में नया दिशा देने का कार्य किया। उनका उदय भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण चरण था, जो सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए था। वे केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एक सशक्त प्रवक्ता थे।


डॉ. मुखर्जी के जीवन में श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में वर्णित स्थितप्रज्ञ के गुणों की झलक मिलती है। उनका जन्म 6 जुलाई 1901 को कलकत्ता में हुआ। उन्हें अपने पिता, सर आशुतोष मुखर्जी से राष्ट्रभक्ति और ज्ञान के प्रति निष्ठा मिली। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से उच्चतम अंक प्राप्त किए और केवल 33 वर्ष की आयु में विश्वविद्यालय के कुलपति बने।


उन्होंने औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली के स्थान पर भारतीय दृष्टिकोण को महत्व देने का प्रयास किया। उन्होंने गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर को आमंत्रित किया और कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भाषण बांग्ला में कराया।


डॉ. मुखर्जी का मानना था कि शिक्षा केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का आधार है।


उनके राजनीतिक विचारों को समझने के लिए उस समय के कठिन दौर को देखना आवश्यक है, जब देश की एकता संकट में थी। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राज्य की संप्रभुता की रक्षा के लिए नीति और शक्ति का वर्णन किया गया है, और डॉ. मुखर्जी का सार्वजनिक जीवन उसी का आधुनिक रूप था।


1947 में, जब मुस्लिम लीग बंगाल को पाकिस्तान में मिलाने की योजना बना रही थी, डॉ. मुखर्जी ने स्पष्ट किया कि यदि भारत का विभाजन धर्म के आधार पर हो रहा है, तो बंगाल का विभाजन भी उसी आधार पर होना चाहिए। उनके साहस के कारण पश्चिम बंगाल भारत का हिस्सा बना रहा।


स्वतंत्रता के बाद, डॉ. मुखर्जी को भारत के पहले मंत्रिमंडल में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री बनाया गया। उन्होंने औद्योगिक विकास की प्रारंभिक रूपरेखा में महत्वपूर्ण योगदान दिया।


डॉ. मुखर्जी ने 8 अप्रैल 1950 को केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया, जब उन्होंने देखा कि दिल्ली समझौते में हिंदुओं की सुरक्षा की कोई चिंता नहीं थी।


21 अक्टूबर 1951 को, उन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना की, जो केवल सत्ता प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन के रूप में स्थापित हुआ।


डॉ. मुखर्जी का सबसे महत्वपूर्ण संघर्ष जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के लिए था। उन्होंने कहा— एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे। यह नारा भारत की एकता का उद्घोष था।


मई 1953 में, डॉ. मुखर्जी बिना परमिट के जम्मू-कश्मीर में प्रवेश कर गए और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 23 जून 1953 को उनकी रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई।


उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया। यह उपनिषदों के उस वाक्य को साकार करता है— न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैकेनामृतत्वमानशुः।


डॉ. मुखर्जी का मूल्यांकन केवल उनकी तत्कालीन सफलता या असफलता से नहीं, बल्कि उनके विचारों के गहरे प्रभाव से किया जाना चाहिए।


वे स्वतंत्र भारत के उन विरले राष्ट्रपुरुषों में थे, जिन्होंने देश को विखंडन से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


उनकी जयंती पर सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके आदर्शों को समझें और एक सशक्त, समृद्ध भारत के निर्माण में अपनी भूमिका निभाएं।