ड्रोन निर्माण में आत्मनिर्भरता की आवश्यकता पर जोर: राजनाथ सिंह
ड्रोन टेक्नोलॉजी का महत्व
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को नई दिल्ली में आयोजित नेशनल डिफेंस इंडस्ट्रीज कॉन्क्लेव में कहा कि वर्तमान में विश्व रूस-यूक्रेन और ईरान-इजरायल के बीच चल रहे संघर्षों को देख रहा है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भविष्य के युद्धों में ड्रोन और काउंटर-ड्रोन तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।
आत्मनिर्भरता की आवश्यकता
उन्होंने बताया कि भारत को एक ऐसा ड्रोन निर्माण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने की आवश्यकता है, जिसमें हम पूरी तरह से आत्मनिर्भर हों। यह आत्मनिर्भरता केवल उत्पादों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसके घटकों के स्तर पर भी होनी चाहिए। ड्रोन के मॉड्यूल, सॉफ्टवेयर, इंजन और बैटरी सभी भारत में निर्मित होने चाहिए।
स्वदेशी रक्षा उपकरणों का निर्माण
नेशनल डिफेंस इंडस्ट्रीज कॉन्क्लेव का मुख्य उद्देश्य स्वदेशी रक्षा उपकरणों के निर्माण को बढ़ावा देना है। यह भारत में रक्षा उपकरणों के निर्माण के लिए एक मजबूत ढांचा स्थापित करने का प्रयास है, विशेषकर निजी कंपनियों और छोटे एवं मध्यम उद्योगों को इस क्षेत्र में शामिल करने पर जोर दिया जा रहा है।
एमएसएमई का योगदान
राजनाथ सिंह ने एमएसएमई और अन्य उद्योगों से अपील की कि वे इस कार्य में देश की मदद करें। उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से हर प्रकार का समर्थन मिलेगा और सभी को मिलकर काम करना होगा ताकि 2030 तक भारत स्वदेशी ड्रोन निर्माण का वैश्विक केंद्र बन सके।
उद्योगों की भूमिका
उन्होंने कहा कि किसी भी देश के रक्षा औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र को विकसित करने में बड़ी उद्योगों, एमएसएमई, स्टार्टअप्स और नवप्रवर्तकों की भूमिका होती है। सरकार की स्पष्ट नीतियों का भी इसमें योगदान होता है। छोटे विचारों से बड़े परिवर्तन संभव हैं।
आर्थिक योगदान
रक्षा मंत्री ने बताया कि भारत की जीडीपी में उद्योगों का योगदान लगभग 15-16 प्रतिशत है, जो एमएसएमई के विकास की संभावनाओं को दर्शाता है। निर्माण क्षेत्र के विस्तार से अर्थव्यवस्था को और मजबूत किया जा सकता है।
सरकारी प्रयास
उन्होंने कहा कि सरकार ने एमएसएमई क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। 2014 के बाद से प्रधानमंत्री ने इस क्षेत्र के विकास पर ध्यान केंद्रित किया है।
संख्यात्मक वृद्धि
राजनाथ सिंह ने आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि 2012-13 में देश में एमएसएमई की संख्या लगभग 4.67 करोड़ थी, जो अब बढ़कर लगभग 8 करोड़ हो गई है।
नवाचार का महत्व
उन्होंने बताया कि 58 प्रोटोटाइप को खरीदने के लिए मंजूरी मिल चुकी है, जिनकी औसत वैल्यू लगभग 3,853 करोड़ रुपए है। यह दर्शाता है कि नवाचार धीरे-धीरे उत्पाद और तकनीक के रूप में सामने आ रहा है।