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तमिलनाडु चुनाव: राजाजी की याद और लुटियन की विरासत

तमिलनाडु में विधानसभा चुनावों के दौरान चक्रर्ती राजगोपालाचारी, जिन्हें राजाजी के नाम से जाना जाता है, की याद आ रही है। राष्ट्रपति भवन में उनकी प्रतिमा की स्थापना की गई है, जबकि एडविन लुटियन की प्रतिमा को हटाने का विवाद भी चल रहा है। क्या यह कदम सही है? इस लेख में हम चुनावी राजनीति, राजाजी के सम्मान और लुटियन की विरासत पर चर्चा करेंगे।
 

राजाजी का सम्मान और चुनावी राजनीति

तमिलनाडु में विधानसभा चुनावों के दौरान चक्रर्ती राजगोपालाचारी, जिन्हें आमतौर पर राजाजी के नाम से जाना जाता है, की याद आ रही है। राष्ट्रपति भवन में उनकी प्रतिमा की स्थापना की गई है, जो एक सकारात्मक कदम है। राजाजी के नाम पर रायसीना पहाड़ियों पर एक सड़क भी बनी हुई है, और उन्हें सम्मान मिलना चाहिए। यह दिलचस्प है कि चुनावों के समय राज्यों के महान व्यक्तित्वों को याद किया जाता है। पिछले लोकसभा चुनावों में चौधरी चरण सिंह और कर्पूरी ठाकुर को याद किया गया था, और दोनों को भारत रत्न से सम्मानित किया गया। पश्चिम बंगाल में चुनावों के दौरान बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय और रामकृष्ण परमहंस की भी चर्चा हो रही है। पिछले चुनावों में रविंद्रनाथ टैगोर और ईश्वरचंद विद्यासागर को भी याद किया गया था।


लुटियन की विरासत पर सवाल

हालांकि, राजाजी को याद करने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन उनकी प्रतिमा स्थापित करने के लिए एडविन लुटियन की प्रतिमा को हटाना एक विवादास्पद कदम है। ऐसा प्रचार किया गया जैसे लुटियन गुलामी का सबसे बड़ा प्रतीक हैं, और उनकी प्रतिमा हटाने से भारत को गुलामी की मानसिकता से मुक्ति मिल जाएगी। सच्चाई यह है कि लुटियन का भारत की गुलामी से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने रायसीना पहाड़ियों पर एक सुंदर शहर की कल्पना की थी। इसलिए, उनकी मूर्ति हटाने से लुटियन की विरासत समाप्त नहीं होगी। इसके लिए राष्ट्रपति भवन और उस क्षेत्र में बनी सभी इमारतों को नष्ट करना होगा। क्या हम चंडीगढ़, जिसे कार्बूजिए ने डिजाइन किया, को भी नष्ट करेंगे गुलामी की मानसिकता से मुक्ति के लिए? लुटियन की दिल्ली और चंडीगढ़ के डिजाइन की तुलना गुरुग्राम और नोएडा के डिजाइन से करें।