×

तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार, ईरान संकट का असर

ईरान से जुड़े संघर्षों के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आपूर्ति बाधित हो गई है, जिससे कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ने इसे अस्थायी कीमत बताया है, जबकि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संकट जारी रहता है, तो कीमतें और बढ़ सकती हैं। जानें इस स्थिति का वैश्विक वित्तीय बाजारों पर क्या असर हो रहा है और भविष्य में क्या संभावनाएं हैं।
 

तेल की कीमतों में वृद्धि

ईरान से जुड़े संघर्षों के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आपूर्ति में रुकावट आई है, जिससे कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो गई हैं।


अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस वृद्धि का बचाव करते हुए कहा कि यह ईरान के परमाणु खतरे का सामना करने की अस्थायी कीमत है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा कि ईरान के खतरे को समाप्त करने के बाद तेल की कीमतें जल्द ही कम हो जाएंगी।


मध्य पूर्व में उत्पादन में कमी

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतें लगभग 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं, क्योंकि मध्य पूर्व के प्रमुख तेल उत्पादकों ने उत्पादन में कमी की है।


वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) क्रूड की कीमत में 20.75 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो 109.75 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई है। ब्रेंट क्रूड की कीमत भी 18 प्रतिशत से अधिक बढ़कर लगभग 109.48 डॉलर प्रति बैरल हो गई है।


बाजार पर प्रभाव

विशेषज्ञों का मानना है कि यह उछाल इसलिए आया है क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति बाधित रहने की आशंका है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल परिवहन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।


वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार, क्षेत्र में हमलों के कारण तेल टैंकरों की आवाजाही में कमी आई है।


आर्थिक प्रभाव

खाड़ी क्षेत्र के कुछ तेल उत्पादकों ने उत्पादन कम करना शुरू कर दिया है, जिससे भंडारण टैंक भरने लगे हैं। इस स्थिति का असर वैश्विक वित्तीय बाजारों पर भी पड़ा है, जहां एशियाई बाजारों में गिरावट देखी गई है।


विश्लेषकों का कहना है कि यदि संघर्ष लंबा चलता है, तो तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं। कुछ अनुमानों के अनुसार, कच्चा तेल इस साल के अंत तक 143 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है।


भविष्य की संभावनाएं

ऊर्जा इतिहासकारों का कहना है कि यह स्थिति वैश्विक तेल उत्पादन में सबसे बड़ा व्यवधान बन सकती है।


अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस संकट का सबसे अधिक प्रभाव एशिया और यूरोप पर पड़ेगा, क्योंकि ये क्षेत्र फारस की खाड़ी से आने वाले ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं।