दिल्ली आबकारी नीति केस में न्याय मित्र की नियुक्ति का निर्णय
केजरीवाल की अपील और न्याय मित्र की नियुक्ति
दिल्ली आबकारी नीति मामले में अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को अपने केस से हटाने की मांग की थी। जब उनकी यह अपील अस्वीकृत हुई, तो केजरीवाल ने अदालत में पेश होने से मना कर दिया। इस स्थिति में यह सवाल उठ रहा था कि आरोपी के अनुपस्थित रहने पर केस का आगे क्या होगा। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अब कहा है कि वे कुछ वरिष्ठ वकीलों को एमिकस क्यूरी यानी न्याय मित्र के रूप में नियुक्त करेंगी, ताकि इस मामले को आगे बढ़ाया जा सके। उन्होंने निचली अदालत के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई को 8 मई तक के लिए स्थगित कर दिया है.
निचली अदालत का फैसला और सीबीआई की चुनौती
निचली अदालत ने आबकारी नीति मामले में अरविंद केजरीवाल और अन्य आरोपियों को आरोप मुक्त कर दिया था। सीबीआई ने इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी है। यह मामला जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच को सौंपा गया है, जिसके कारण केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक ने उनकी अदालत में पेश होने से इनकार कर दिया। दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि इन तीनों का प्रतिनिधित्व करने के लिए न्याय मित्र की नियुक्ति की जाएगी। इन नेताओं ने स्वर्ण कांता को हटाने की अपील की थी, लेकिन उन्होंने इससे इनकार कर दिया।
न्याय मित्र की नियुक्ति की प्रक्रिया
दिल्ली हाई कोर्ट ने सीबीआई की याचिका पर सुनवाई को 8 मई तक स्थगित कर दिया है। अदालत ने कहा कि मामले को आगे बढ़ाने के लिए किसी की नियुक्ति के बाद ही उचित होगा। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा, 'मैं न्याय मित्र नियुक्त करूंगी। मैं इस मामले में तीन वरिष्ठ वकीलों को नियुक्त करूंगी।' सीबीआई की ओर से उपस्थित सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पूछा कि क्या अदालत केजरीवाल और अन्य के लिए यह नियुक्ति कर रही है, जिनका कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। जस्टिस स्वर्ण कांता ने इस पर 'हां' में उत्तर दिया।
न्याय मित्र की भूमिका
जस्टिस स्वर्ण कांता ने कहा, 'हम इसे शुक्रवार को सूचीबद्ध करेंगे। मैं न्याय मित्र के विषय पर एक आदेश जारी करूंगी और फिर सुनवाई शुरू करूंगी।' उल्लेखनीय है कि जस्टिस स्वर्ण कांता ने 20 अप्रैल को उन याचिकाओं को खारिज कर दिया था, जिसमें उनसे इस मामले से अलग होने का अनुरोध किया गया था। केजरीवाल, सिसोदिया और दुर्गेश पाठक ने पत्र लिखकर कहा कि वे स्वयं या वकील के माध्यम से उनके समक्ष पेश नहीं होंगे और 'महात्मा गांधी के सत्याग्रह के मार्ग' का अनुसरण करेंगे।
न्याय मित्र की नियुक्ति का महत्व
भारत की सर्वोच्च अदालत ने कई मामलों में न्याय मित्र की नियुक्ति की आवश्यकता पर जोर दिया है। यदि कोई आरोपी अदालत में पेश नहीं होता है, तो न्याय मित्र की नियुक्ति की जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में कहा था कि गंभीर मामलों में, जैसे फांसी या आजीवन कारावास, कम से कम 10 साल के अनुभव वाले व्यक्ति को न्याय मित्र नियुक्त किया जाना चाहिए। यदि मामला उच्च न्यायालय में हो, तो उच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। न्याय मित्र को आरोपी से मुलाकात और चर्चा करने की अनुमति भी होती है.
आगे की सुनवाई
इस मामले में, निचली अदालत ने 27 फरवरी को अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और 21 अन्य को आबकारी नीति मामले में बरी कर दिया था। लेकिन 9 मार्च को जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच ने सीबीआई के जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश पर रोक लगा दी। सीबीआई की याचिका पर सभी 23 आरोपियों को नोटिस जारी करते हुए जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि आरोप तय करने के चरण में अधीनस्थ अदालत की कुछ टिप्पणियां और निष्कर्ष प्रथम दृष्टा त्रुटिपूर्ण प्रतीत होते हैं और उन पर विचार करने की आवश्यकता है.