दिल्ली दंगा मामले में 12 आरोपियों को बरी, अदालत ने कहा- भीड़ का हिस्सा होना अपराध नहीं
अदालत का निर्णय: व्यक्तिगत अपराध का सबूत आवश्यक
नई दिल्ली: 2020 में दिल्ली में हुए दंगों से संबंधित मामले में, अदालत ने हत्या, दंगा और डकैती के आरोपों का सामना कर रहे 12 व्यक्तियों को बरी कर दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को केवल इसलिए आपराधिक जिम्मेदारी नहीं दी जा सकती क्योंकि वह एक गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा था। अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी के खिलाफ व्यक्तिगत अपराध का सबूत होना आवश्यक है।
भीड़ में शामिल होने के आरोप पर दोष साबित नहीं किया जा सकता
एडीशनल सेशन कोर्ट के जज परवीन सिंह ने 25 अगस्त को दिए आदेश में कहा कि किसी व्यक्ति का घातक हथियार के साथ गैरकानूनी सभा में होना उसका व्यक्तिगत कार्य है, जो आईपीसी की धारा 144 के तहत अपराध बनता है। केवल भीड़ का सदस्य होने के आधार पर किसी व्यक्ति पर आरोप नहीं लगाया जा सकता। अभियोजन को हर आरोपी के खिलाफ उन विशेष कृत्यों का सबूत पेश करना होगा, जिनसे अपराध हुए।
मुरसलीन की हत्या का मामला
सभी 12 आरोपी मुरसलीन की हत्या के मामले में शामिल थे, जिनका शव 28 फरवरी 2020 को जौहरीपुर तिराहे के पास एक नाले में मिला था। अभियोजन के मुख्य गवाह दिवेश राजपूत को मुरसलीन की हत्या का चश्मदीद बताया गया था, लेकिन सुनवाई के दौरान वह अपने बयान से मुकर गया।
गवाहों के बयान पर अदालत की टिप्पणी
कोर्ट ने कहा कि लंबी जिरह के बावजूद गवाह के बयान में ऐसा कुछ नहीं था, जिससे आरोपियों का गैरकानूनी भीड़ या हत्या से संबंध साबित हो सके। एक अन्य गवाह निसार अहमद ने भी आरोपियों पर कोई विशेष कृत्य करने का आरोप नहीं लगाया।
भीड़ की पहचान पर अदालत का विचार
कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल यह कहना कि जौहरीपुर पुलिया पर देखी गई भीड़ ही घटना के लिए जिम्मेदार थी, यह पर्याप्त नहीं है। अदालत ने उस पुलिस गवाह पर अभियोजन की निर्भरता को भी खारिज कर दिया, जो भीड़ में मौजूद लोगों की पहचान नहीं कर सका।
हिमांशु पर मोबाइल रखने का आरोप साबित
हालांकि, अदालत ने हिमांशु ठाकुर को आईपीसी की धारा 411 के तहत दोषी ठहराया, क्योंकि मुरसलीन का मोबाइल फोन उसके पास से मिला था और वह उस हैंडसेट में सिम कार्ड का उपयोग कर रहा था।