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दिल्ली में अवैध निर्माण की समस्या: हादसों का सिलसिला जारी

दिल्ली में अवैध निर्माण और सुरक्षा नियमों की अनदेखी के कारण हाल के हादसों ने गंभीर चिंता पैदा कर दी है। सत्य निकेतन में हुई इमारत गिरने की घटना ने कई सवाल खड़े किए हैं, जैसे कि क्या इमारत छात्रों के लिए सुरक्षित थी? सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्षों में कई लोग आग और इमारतों के गिरने से मारे गए हैं। क्या दिल्ली में एक व्यापक आवासीय सर्वेक्षण की आवश्यकता है? जानें इस मुद्दे की गहराई में जाकर।
 

दिल्ली में निर्माण संबंधी सुरक्षा चिंताएँ


हर हादसे के बाद उठने वाले सवाल हैं। दरअसल, राष्ट्रीय राजधानी अवैध और असुरक्षित निर्माण के लिए एक केंद्र बन गई है, जहां सुरक्षा नियमों की अनदेखी की जा रही है।


हाल के घटनाक्रमों पर गौर करें, जैसे कि दिल्ली में इमारतों का गिरना और आग लगना, तो यह स्पष्ट होता है कि यह समस्या कितनी गंभीर है। हाल ही में सत्य निकेतन में एक इमारत ढही, जिसमें कई छात्र पेइंग गेस्ट के रूप में रह रहे थे। इस घटना ने लोगों को गहरे सदमे में डाल दिया है। इसी तरह, जुलाई 2024 में एक कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में पानी भरने से तीन छात्रों की जान चली गई थी। इसी वर्ष मई में साकेत में एक बिल्डिंग गिरी, और जून में हौजरानी में एक होटल में आग लगने से 23 लोगों की मृत्यु हुई।


इन सभी घटनाओं में कुछ समानताएँ हैं, जैसे कि इमारतों का अनियमित उपयोग, अवैध निर्माण और सुरक्षा नियमों की अनदेखी। आमतौर पर यह आरोप लगाया जाता है कि यह सब अधिकारियों, जन प्रतिनिधियों और ठेकेदारों की मिलीभगत से होता है। सत्य निकेतन की घटना में सवाल उठते हैं कि क्या वह इमारत छात्रों की संख्या के लिए उपयुक्त थी? क्या आवश्यक इजाजत और सुरक्षा मंजूरी ली गई थी? जब लोग वहां रह रहे थे, तब बिल्डिंग के बेसमेंट में निर्माण कार्य कैसे चल रहा था? इसकी अनुमति किसने दी? क्या किसी सरकारी विभाग ने इसकी निगरानी की थी? ये सभी सवाल हर हादसे के बाद उठते हैं।


सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2024 में 113 और 2025 में 70 लोग आग और इमारतों के गिरने से संबंधित हादसों में मारे गए। हर बार जांच और कार्रवाई की घोषणाएँ होती हैं, लेकिन कभी यह नहीं सोचा जाता कि दिल्ली में एक व्यापक आवासीय सर्वेक्षण किया जाए और अवैध रिहाइश को रोका जाए। जब तक ऐसा नहीं होता, यह समस्या यूं ही बनी रहेगी!